बरेली की घटना के बाद एक पहलू यह भी उभरकर सामने आ रहा है कि मध्यप्रदेश किसान राजनीति का इन दिनों केंद्र बनते जा रहा है. यह राजनीति कई जाजम पर है, जिसमें प्रमुख है केन्द्र और राज्य की भूमिका में ज्यादा किसान हितैषी कौन है? दूसरा प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस भी आमने-सामने आ गई है. तीसरा, सरकार और आरएसएस के आनुषंगिक संगठन भारतीय किसान संघ के बीच निरन्तर बढ़ रही तकरार और चौथा यह कि क्या किसान संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा अब संघ के नियंत्रण से भी वाकई बाहर जा रहे हैं या फिर कोई और ‘अदृश्य राजनीति’ है. लेकिन इन सबसे भी बड़ा एक सवाल यह है कि कहीं इन सब उलझनों में अन्नदाता किसान की मुश्किलें और तो नहीं बढ़ जाएंगी?

बहुत जल्दी ही नया फसल चक्र प्रारंभ होने जा रहा है. खेत नई बोवनी के लिए तैयार हैं. खाद, बीज के लिये किसानों को भटकना नहीं पड़े- यह चिंता भी व्यवस्था को सतर्कता के साथ करना होगी. बैंक ऋण किसानों को आसानी से उपलब्ध हों. बरेली के बहाने ही सही सरकार को प्रदेश के संदर्भ में यह सावधानी भी रखना होगी कि कहीं प्रदेश में गेहूं सड़ाने की मंशा के साथ कोई माफिया तो काम नहीं कर रहा है? दूसरे राज्यों में कुछ एक मिसालें ऐसी सामने आई हैं कि गोदामों में शराब रखी गई और गेहूं बाहर इसलिए सडऩे दिया गया कि शराब माफिया को सड़ा गेहूं सस्ते दामों पर उपलब्ध हो सके. इसी तरह सरकार को इस बात की भी सावधानी बरतनी पड़ेगी कि हर मंडी कितनी किसान हितैषी है? मंडियां कृषि उपज से ही अपनी आय बढ़ा रही हैं. अपनी उपज लेकर मंडी में आए किसान को किसी मुद्दे पर यदि निराश होना पड़ता है तो यह सरकार के ‘कड़े तेवरÓ का प्रसंग होना चाहिए. उसके सामने केवल अन्नदाता किसान की खुशी होना चाहिए. हर मंडी स्तर पर इसका विश्लेषण होना चाहिए. बारदाने या गोडाउन इनका वैकल्पिक प्रबंधन भी अविलंब जिला स्तर पर करना चाहिए.

जिला प्रशासन की प्राथमिकता मंडी, वेयर हाउस, कृषि विभाग तथा अन्य महकमों के साथ समन्वय भी होना चाहिए. बरेली पर किसी भी स्तर पर ज्यादा राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप न होकर केवल यह सोचा और क्रियान्वित किया जाना चाहिए कि हम अपने संसाधनों के साथ जितना श्रेष्ठï हो सके वास्तव में किसान हितैषी हो सके.

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