नई दिल्ली,22 सितंबर. अपनी कलात्मक बल्लेबाजी से अधिक कप्तानी के कारण क्रिकेट जगत में अमिट छाप छोडऩे वाले मंसूर अली खां पटौदी ने भारतीय क्रिकेट में नेतृत्व कौशल की नई मिसाल और नए आयाम जोड़े थे, वह पटौदी ही थे जिन्होंने भारतीय खिलाडिय़ों में यह आत्मविश्वास जगाया था कि वे भी जीत सकते हैं.

पटौदी का जन्म भले ही पांच जनवरी 1941 को भोपाल के नवाब परिवार में हुआ था लेकिन उन्होंने हमेशा विषम परिस्थितियों का सामना किया. चाहे वह निजी जिंदगी हो या फि र क्रिकेट, तब 11 साल के जूनियर पटौदी ने क्रिकेट खेलनी शुरू भी नहीं की थी कि ठीक उनके जन्मदिन पर उनके पिता और पूर्व भारतीय कप्तान इफ्तिखार अली खां पटौदी का निधन हो गया था. इसके बाद जब पटौदी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खेलना शुरू किया तो 1961 में कार दुर्घटना में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई, इसके बावजूद वह पटौदी का जज्बा और क्रिकेट कौशल ही था कि उन्होंने भारत की तरफ  से न सिर्फ  46 टेस्ट मैच खेलकर 34.91 की औसत से 2793 रन बनाए बल्कि इनमें से 40 मैच में टीम की कप्तानी भी की.

पटौदी भारत के पहले सफ ल कप्तान थे, उनकी कप्तानी में ही भारत ने विदेश में पहली जीत दर्ज की. भारत ने उनकी अगुवाई में नौ टेस्ट मैच जीते जबकि 19 में उसे हार मिली. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पटौदी से पहले भारतीय टीम ने जो 79 मैच खेले थे उनमें से उसे केवल आठ में जीत मिली थी और 31 में हार. यही नहीं इससे पहले भारत विदेशों में 33 में से कोई भी टेस्ट मैच नहीं जीत पाया था. यह भी संयोग है कि जब पटौदी को कप्तानी सौंपी गई तब टीम वेस्टइंडीज दौरे पर गई. नियमित कप्तान नारी कांट्रैक्टर चोटिल हो गए तो 21 वर्ष के पटौदी को कप्तानी सौंपी गई. वह तब सबसे कम उम्र के कप्तान थे।

यह रिकार्ड 2004 तक उनके नाम पर रहा. पटौदी 21 साल 77 दिन में कप्तान बने थे, जिंबाब्वे के तातैंडा तायबू ने 2004 में यह रिकार्ड अपने नाम किया था. टाइगर पटौदी की क्रिकेट की कहानी देहरादून के वेल्हम स्कूल से शुरू हुई थी लेकिन अभी उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया था कि उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद जूनियर पटौदी को सभी भूल गए. इसके चार साल बाद ही अखबारों में उनका नाम छपा जब विनचेस्टर की तरफ  से खेलते हुए उन्होंने अपनी बल्लेबाजी से सभी को प्रभावित किया. अपने पिता के निधन के कुछ दिन ही बाद पटौदी इंग्लैंड आ गए थे.

वह जिस जहाज में सफ र कर रहे थे उसमें वीनू मांकड़, फ्रेक वारेल, एवर्टन वीक्स और सनी रामादीन जैसे दिग्गज क्रिकेटर भी थे. वारेल का तब पता नहीं था कि वह जिस बच्चे से मिल रहे हैं 10 साल बाद वही उनके साथ मैदान पर टास के लिए उतरेगा. नेतृत्व क्षमता उनकी रगों में बसी थी. विनचेस्टर के खिलाफ उनका करियर 1959 में चरम पर था जबकि वह कप्तान थे. उन्होंने तब स्कूल क्रिकेट में डगलस जार्डिन का रिकार्ड तोड़ा था. पटौदी ने इसके बाद दिल्ली की तरफ  से दो रणजी मैच खेले और दिसंबर 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ  फि रोजशाह कोटला मैदान पर पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला. यह मैच बारिश से प्रभावित रहा था.  पटौदी वास्तव में टाइगर का दिल रखते थे और भारत का युवा कप्तान प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए बना था.

जब दुर्घटना में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई तो सभी ने मान लिया था कि उनका क्रिकेट करियर समाप्त हो गया है लेकिन वह इसके छह महीने बाद वह फिर से क्रिकेट मैदान पर थे. उन्हें इसके बाद 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ  तीसरे टेस्ट मैच में खेलने के लिए राष्ट्रीय टीम में भी शामिल कर लिया गया. इस मैच में तो वह अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए लेकिन कोलकाता में अगले मैच में उन्होंने 64 रन बनाए. उनके करारे शाट से दर्शक तब झूमने लगे थे. भारत ने आखिर में यह मैच 187 रन से जीता था. चेन्नई में फि र से उन्होंने 103 रन की पारी खेलकर खुद को मैच विजेता साबित किया था. इस पारी में उन्होंने 14 चौके और दो छक्के लगाए थे. वेस्टइंडीज दौरे में वह मांस पेशियों में खिंचाव की समस्या से जूझते रहे लेकिन तीसरे और चौथे टेस्ट मैच में उन्होंने 48 और 47 रन की दो जुझारू पारियां खेली थी. इसके बाद 1964 में इंग्लैंड टीम के भारत दौरे के शुरू में वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए लेकिन दिल्ली में उन्होंने नाबाद 203 रन की पारी खेलकर इसकी भरपाई कर दी जो उनका उच्चतम स्कोर भी है.

आस्ट्रेलियाई टीम जब तीन मैच के लिए भारतीय दौरे पर आई तो पटौदी ने अपने पिता की तरह इस टीम के खिलाफ अपने पहले टेस्ट मैच में शतक जडऩे का अनोखा रिकार्ड बनाया. यह बेहद यादगार पारी थी. उन्होंने जिस तरह से विवियर्स और मार्टिन जैसे गेंदबाजों के खिलाफ दबदबे से बल्लेबाजी की उसकी मिसाल आगे भी युवा क्रिकेटरों के सामने दी जाती रही. अगले टेस्ट मैच में उन्होंने 86 और 53 रन की दो जानदार पारियां खेली और भारत को नाटकीय जीत दिलाई. न्यूजीलैंड की टीम जब भारत आई तो पटौदी ने कोलकाता में 153 और दिल्ली में 113 रन की जोरदार पारियां खेली थी. इसके बाद वेस्टइंडीज का दौरा खास नहीं रहा लेकिन इंग्लैंड दौरे में हैंडिग्ले में खेली गई उनकी 148 रन की पारी उनकी सर्वश्रेष्ठ पारियों में गिनी जाती है. उनके करियर का सबसे यादगार दौर 1968 में भारत का न्यूजीलैंड दौरा था. भारत ने तब पहली बार विदेशी सरजमीं पर टेस्ट मैच और टेस्ट सीरीज 3.1 से जीती थी. पटौदी 1969 तक भारतीय टीम के कप्तान रहे. इसके बाद वह विभिन्न कारणों से टीम का हिस्सा नहीं बन पाए. उन्हें हालांकि फिर से 1973 में टीम में वापसी का मौका मिला और फि र उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ पांच मैचों में कप्तानी की थी. इन मैचों में हालांकि उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया. वह इसके बाद भी एक साल तक प्रथम श्रेणी मैच खेलते रहे जिसके बाद उन्होंने संन्यास ले लिया.

संन्यास लेने के बाद उन्होंने 1993 से 1996 तक आईसीसी मैच रेफ री की भूमिका भी निभाई, वह दो टेस्ट और 10 वनडे मैचों में मैच रेफ री रहे. उन्हें 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग की संचालन परिषद में शामिल किया गया था. उन्होंने 2010 में यह पद छोड़ दिया था, उन्होंने पिछले साल के शुरू में बीसीसीआई पर भुगतान नहीं करने का मामला भी दर्ज किया था. पटौदी को 1964 में अर्जुन पुरस्कार और 1967 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. उन्होंने भारतीय सिने तारिका शर्मिला टैगोर से 1969 में शादी की थी और उनके तीन बच्चे सैफ अली के अलावा सोहा अली खान और सबा अली खान हैं.

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