शोध बताते हैं कि 15 मिनट खेलने केबाद आपको अपने भीतर ऊर्जा महसूस होती है, लेकिन टीवी महज आंखों में जलन और थकान का अनुभव कराता है. अमूमन किशोर दिन के दो से तीन घंटे टीवी के आगे बिताते हैं, जिससे न सिर्फ उनकी मानसिक स्थिति पर कुप्रभाव पडता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बहुत प्रभावित होता है. अध्ययनों के अनुसार, मीडिया में जिस तरह रक्तरंजित और सनसनीखेज खबरों का दौर चल निकला है, उसका टीनएजर्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.

पिछले दो दशकों में किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि टीवी पर आने वाले हिंसक कार्यक्रमों का उन पर इस तरह प्रभाव पड़ता है-

1.     ऐसे कार्यक्रमों में स्त्री को हमेशा निरीह भुक्तभोगी के बतौर दिखाया जाता है. लड़कियों के मन में भय पैदा होता है. उन्हें लगता है कि उनके इर्द-गिर्द का समाज बहुत दूषित है. उनके मन में समाज की नकारात्मक छवि रच-बस जाती है.

2.    कार्टूंस भी किशोरों को हिंसक बना रहे हैं. एक ओर जहां उनकी भाषा-शैली गलत प्रभाव डाल रही है, वहीं दूसरी ओर स्टंट दिखाने वाले कई धारावाहिक और उनके करामाती चरित्र बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे भी इतने ही बलशाली और ताकतवर हो सकते हैं.

3.     अध्ययन बताते हैं कि ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चों के स्कूल प्रदर्शन और उनकी याददाश्त क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. वे चिड़चिड़े हो रहे हैं. स्कूल के बाद बचे समय में पुस्तकों, शारीरिक गतिविधियों, संगीत, प्रकृति के सान्निध्य में या अन्य रचनात्मक कार्यो में खर्च होने वाला समय टीवी ले रहा है.

4.     टेलीविजन एडिक्शन शीर्षक से एक मैगजीन में प्रकाशित लेख के अनुसार, टीवी दर्शकों को अपना आदी बना लेता है। रिमोट में स्विच ऑफ के विकल्प के बावजूद लोगों पर अनावश्यक चैनल्स बदलने की खब्त सवार रहती है.

5.     शोध बताते हैं कि 15 मिनट खेलने केबाद आपको अपने भीतर ऊर्जा महसूस होती है, लेकिन टीवी महज आंखों में जलन और थकान का अनुभव कराता है. अमूमन किशोर दिन के दो से तीन घंटे टीवी के आगे बिताते हैं, जिससे न सिर्फ उनकी मानसिक स्थिति पर कुप्रभाव पडता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बहुत प्रभावित होता है.

6.     अध्ययनों के अनुसार, मीडिया में जिस तरह रक्तरंजित और सनसनीखेज खबरों का दौर चल निकला है, उसका टीनएजर्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. वे समय से पूर्व परिपक्व हो रहे हैं. उन्हें बड़ी से बड़ी घटना भी महज एक खबर लगती है. टीवी उनकी संवेदनशीलता खत्म कर रहा है.

7.     अकेले टीवी देखना ज्यादा हानिकारक है. बड़े होते बच्चे अपनी सहज बुद्धि के अनुसार दृश्यों का अर्थ निकालते हैं. माता-पिता साथ बैठकर टीवी देखें, उन्हें चीजों का मर्म समझाएं तो किशोरों के मन में सही संदेश जा सकता है.

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