कर्नाटक राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने पहले साझा व बाद में स्वयं की सरकार को पार्टी नेतृत्व ने दक्षिण भारत में पार्टी का प्रवेश द्वार माना. लेकिन समय के साथ-साथ वह उसका समस्या द्वार बन गया है. कर्नाटक के भाजपा के नेता एवं भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री येदुरप्पा की राजनैतिक, प्रशासनिक व न्यायिक तौर पर जितनी दुर्दशा हो सकती है वह हो चुकी है. लेकिन श्री येदुरप्पा ने भी पार्टी की जितनी फजीयत हो सकती है, वह कर डाली. पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व एक समाधान ढूंढता है और उसी में से दूसरी समस्या सामने आ  जाती है.

पार्टी ने लौह खनन घोटाला व रिश्वत लेने के मामले में श्री येदुरप्पा को बड़ी मुश्किल में पद से हटा पाए. श्री सदानंद गौडा मुख्यमंत्री बनाए गए और पार्टी यही चाहती थी. यदि श्री येदुरप्पा जांचों, मुकदमों व आरोप में बेदाग होकर निकलते हैं तभी वह पद पाने के हकदार हो सकते हैं. जब तक श्री गौड़ा सरकार चलाएं. श्री येदुरप्पा पार्टी पर भारी पड़े और उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया कि श्री जगदीश शेट्टïर जो उनके लिंगायत समुदाय के हैं, उन्हें ही गौड़ा को हराकर मुख्यमंत्री बनाया जाए और पार्टी को झुककर यह मानना पड़ा. लेकिन इस समाधान के साथ ही इसमें यह समस्या आ गयी कि विधायक दल की बैठक मेें येदुरप्पा समर्थक 70 विधायकों ने भी भाग लिया और 50 गौड़ा समर्थक बाहर रहे. इससे यह जाहिर हो गया कि येदुरप्पा व गौड़ा के समर्थकों में कोई बड़ा अंतर नहीं है.

मात्र 20 विधायकों का फर्क नजर आ रहा है. यदि जनता दल सेक्युलर और भाजपा की साझा सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कुमारा स्वामी

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