पांच देशों के आर्थिक सहयोग संगठन ब्रिक्स- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण फैसले का परस्पर आर्थिक उन्नति में बहुत बड़ी प्रगति के करार किये है.

अभी तक अमेरिका का डॉलर विश्व व्यापार की विनिमय मुद्रा बना हुआ है. इसका कारण औपनैवेशिक न होकर परिस्थिति जन्य रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के समय में एशिया और आफ्रीका के देश पराधीनता में बहुत ही पिछड़े राष्ट्र थे. पूरा यूरोप और प्रशांत महासागर के राष्ट्र युद्ध में ध्वस्त हो चुके थे. ऐसे में अमेरिका युद्ध की विभीषिका से मुक्त रहा. सन् 45 में युद्ध समाप्त होने पर उसने यूरोप व अन्य देशों की डालर मुद्रा व वस्तुओं की उधार आपूर्ति से मदद की. इससे  डालर मुद्रा सारे विश्व में सर्वाधिक चलन व जरूरत की मुद्रा बन गई. हाल ही में जब पेट्रो पदार्थों के मूल्य एकाएक बढऩा शुरू हुए तो अरब राष्ट्रों ने यही कहा कि वे कोई भाव नहीं बढ़ा रहे  हैं. बल्कि वैश्विक मंदी में डालर में जो उतार-चढ़ाव आ रहे हैं वे अपनी मुद्रा व पेट्रो पदार्थों के मूल्यों को उससे ‘एडजस्ट’ कर रहे हैं. सभी पेट्रो राष्ट्र डालर में कीमत लेते थे. उसमें उनके दीनार या रियाल मुद्रा का कोई महत्व ही उन्होंने खुद ही नहीं बनाया.

ऐसे ही आर्थिक बाध्यता के वातावरण में यूरोपीय देशों नें यूरोपीय यूनियन बनाकर अपनी मुद्राओं की भी ‘मोनीटरी यूनियन’ बनाकर उसे ‘यूरो’ नाम दे दिया. अभी अमेरिका-ईरान के तनाव से दबाव की राजनीति में अमेरिका ने ईरान के धंधों को अमेरिका में प्रतिबंधित कर दिया. जिससे उसके व्यापार में डालर का विनिमय रुक गया. इसी मजबूरी में अब ईरान अपने पेट्रो खरीददारों से अपनी और उनकी मुद्रा में पेट्रो क्रूड का भाव तय करना पड़ रहा है. उनमें भारत सर्वप्रथम है जिससे ईरान ने रुपये में पेट्रो क्रूड का मूल्य लेना स्वीकार किया है.

सोवियत संघ और चीन एक बहुत ही लंबे समय तक कम्युनिज्म के नाम पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बंद ही रहे. सोवियत रूबल की अंतरराष्ट्रीय ग्राह्यता ही नहीं थी. व्यापार में सबसे पहले भारत उसका व्यापारिक संबंध का देश बना. कहने को तो उससे रुपया-रुबल करार था लेकिन कूटनीतिक गोपनीयता से भारत से डालर लेकर दुनिया में अपना काम चलाता था. पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ पर ‘शीत युद्ध’ के वातावरण में उस पर भारी बोझ बने हुए थे. वहां सोवियत व्यापार वास्तव में सोवियत सप्लाई या आर्थिक मदद ही होती थी. भारत ब्रिटिश उपनिवेश रहा था. उसी प्रभाव में भारत की मुद्रा ‘रुपया’ एक लंबे समय तक ब्रिटेन की मुद्रा पौंड स्टालिंग के आधार पर उसका अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकन होता था. यह श्रेय केवल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को जाता है कि उन्होंने अपने शासन काल को भारत की मुद्रा ‘रुपया’ को पौंड में स्वतंत्र कर संसार की हर मुद्रा में ‘फ्लोटिंग रेट’ बनाकर उसे विश्व अर्थ व्यवस्था में स्वतंत्र रूप से स्थापित किया.

अब ब्रिक्स देशों में वह करार हुआ है कि आपसी मुद्राओं में व्यापार करेंगे और विश्व बैंक की तर्ज पर ‘ब्रिक्स विकास बैंक’ का गठन करेंगे. इसे पांच ब्रिक्स राष्ट्र अपने आर्थिक साधनों से पूंजी जुटायेंगे और वैश्विक आर्थिक संकट में इसे जरूरतमंद ब्रिक्स देश को आर्थिक मदद दी जायेगी. इससे ब्रिक्स देश डालर की अस्थिरता के प्रभाव से बच सकेंगे. अभी इसके कारण पेट्रो क्रूड के डालर आधारित भावों से संसार के सभी देशों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा. इस समय ब्रिक्स देशों को आपसी व्यापार डालर के मूल्यांकन में 250 अरब डालर का है जो शीघ्र ही 500 अरब डालर का हो जायेगा. अब ब्रिक्स अपना स्वयं आर्थिक ढांचा तैयार करने के बाद अपने व्यापार का मूल्यांक ब्रिक्स बैंक के फार्मूले से तय करेंगे. जैसे यूरो देश अपनी मुद्रा व व्यापार का आंकलन यूरो में करते है. जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संसार में पराधीन देशों में स्वतंत्रता पाने की लहर आई थी. उसी तरह इस समय विश्व में मुद्रा स्वतंत्रता पाने की लहर आई हुई है. इसे प्रारंभ करने का श्रेय यूरोपीय संघ और यूरो मुद्रा को जाता है. डॉलर के मूल्यांकन में पेट्रो क्रूड की घटती-बढ़ती कीमतों ने इस प्रक्रिया और अधिक सक्रिय व गतिशील
कर दिया.

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प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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