केंद्र सरकार पिछले तीन वित्त वर्षों से सार्वजनिक के क्षेत्र के बैंकों को काम करने के लिए पूंजी देती जा रही है. इसकी वजह भी यही है कि बैंकों ने कार, ट्रक, दुपहिया व मकानों की खरीदी के लिए सर्वाधिक उपभोक्ता ऋण बांटा. उसके अनुमानों में जितनी मासिक या वार्षिक किश्तों में रुपयों की वापसी आनी थी, वह नहीं आ रही है. बढ़ते मूल्यों के कारण आम आदमी की बचत करने की क्षमता भी घटकर निम्न स्तर पर आती जा रही है. बहुत सा ऐसा कर्ज बिल्कुल न आने से उसके विरुद्ध वसूली, कुर्की आदि की कार्यवाहियों की संख्याएं’ बढ़ती जा रही हैं. इन प्रक्रियाओं में समय बहुत लगता है और बैंक का वसूली खर्च भी बढ़ता जाता है.

पिछले तीन वर्षों में सरकार सार्वजनिक बैंकों को 44,634 करोड़ रुपये दे चुकी है. वर्ष 2010-11 में 20,117 करोड़, 11-12 में 12,000 करोड़ और इस 12-13 में पुन: 12,517 करोड़ रुपये की शेयर पूंजी देने जा रही है. यह रकम सेंट्रल बैंक, विजया बैंक, इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, देना बैंक, ओरियंटल बैंक सहित 10 बैंकों को दी जा
रही है.

औद्योगिक पूंजी पर बैंक ब्याज दर अधिक होने से इस क्षेत्र में पूंजी का उठाव नहीं हुआ और उसकी उत्पादन क्षमता घटने में औद्योगिक वृद्धि दर भी निम्नतम स्तर पर घट गई. ऐसी स्थितियों में बड़े उद्योग जो पैसा उठाने व चुकाने में नियमित होकर बैंकों के बड़े ग्राहक होते थे वे कम होते चले गए. इसी कारण पून्जी देने वाली संस्थायें-बैंकों को पून्जी की जरूरत पडऩे लगी.

सरकार ने बैंकों को भरोसा दिलाया है कि अगले पांच वर्षों तक वर्ष 2018-19 तक सरकारी बैंकों की मदद की जाती रहेगी. रिजर्व बैंक भी भारतीय बैंकों को भविष्य के जोखिमों से बचाने के लिये आर्थिक दृष्टिï से मजबूत करना चाहता है. इसके लिये आगामी अप्रैल में बैंकों के लिये बासेल 3 नियम लागू होंगे. इस नियम के तहत हर बैंक को जोखिम की स्थिति से निपटने के लिये निश्चित अनुपात में राशि सुरक्षित रखनी होगी ताकि भविष्य में वैश्विक मंदी आदि  की बड़ी घटना के समय बैंक व उसके निवेशक तथा ग्राहकों के हित सुरक्षित रहें. ऐसी स्थिति को बनाये रखने के लिये बैंकों को अगले पांच सालों में 5 लाख करोड़ रुपयों की अतिरिक्त राशि की जरूरत पड़ेगी.

पिछली वैश्विक मंदी में अमेरिका जैसे आर्थिक सम्पन्न व शक्तिशाली देश में भी उसके कई नामीगिरामी बैंक तक दिवालियेपन की कगार तक आ गये थे. सरकार का यह कदम तो स्थिति व अर्थव्यवस्था के अनुकूल है कि सरकारी बैंकों की साख बनी रहे अन्यथा आर्थिक क्षेत्र घबराहट में अस्त-व्यस्त हो सकने की आशंका है. लेकिन यदि भारत का उद्योग क्षेत्र जो पूरी तरह स्टेट-आफ-आर्ट टेक्नोलॉजी से सम्पन्न है यदि उसके लिये सस्ती दरों पर पून्जी नहीं जुटाई गई तो निर्यात व्यापार और देश में रोजगार निर्माण के क्षेत्र में भारी संकट बना रहेगा. औद्योगिक क्षेत्र की मजबूती से ही बैंकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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