भोपाल, 19 अक्टूबर. कनकेश्वरी देवी ने कहा कि भगवान की भक्ति से अपने अंत:करण को अमृत बनाओ और बैचारिक शूद्रता से दूर रहो. क्योकि जब राजा शासक और नेताओं में विचारों की शूद्रता आती है तो राजा तथा प्रजा दोनों का ही पतन हो जाता है.

मां कनकेश्वरी देवी रविन्द्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर स्व. प्रसून सारंग की स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा की पांचवीं संध्या पर बोल रहीं थी. इस अवसर पर जामगढ़ गुजरात के प्रख्यात संत पंडित राजेंन्द्र दास भी मंचासीन थे. उन्होने कहा कि श्रीमद्भागवत भगवत नाम स्मरण और सद्गुरू की क्रपा द्रष्टि से ये तीन वस्तुए इंसान के अंत:करण को अमृत बना देती है. व्यक्ति की रग-रग में खून नही अमृत बहने लगता है. संसार में हम आए है तो किसी न किसी प्रकार का जहर हमारे आसपास बहता रहता है.

इसे अज्ञानी लोगों को बताकर रोता फिरता है. लेकिन ज्ञानी इसके परिणाम को जानकर किसी से बताता भी नहीं और रोता भी नहीं. अंत:करण को अमृत बना लो तो फिर बिश का कोई स्पर्स नहीं होता. संसार की रचना ही ऐसी है कि दशों दिशाएं अनुकूल नहीं होती. लेकिन अपने अमृतमयी अंत:करण से इन दिशाओं को अनुकूल अनुभव कर सकते है.  मीरा ने जहर पिया उससे जब पूछा तो उसने कहा मुझे जहर का स्वाद अच्छा लगा. यह मीरा के अंत:करण के अमृत बनने का सच है. श्रीमद भागवत और सद्गुरू अपने अंत:करण को अमृत बना देते है. दुनियां में ऐसे लोग भी है जिन्हें अमृत भी दे तो परिणाम जहर में आता है लेकिन अंत:करण अमृत है जहर भी अमृत बन जाता है. मिट गये सारे अंधेरे जब सबेरा हो गया……..

भागवत अमृत नही लेकिन भागवत अमृत का निर्माण करता है. सद्गुरू के चरणों में आदमी प्रसादिक बन जाता है और प्रसादिक जीवन दार्शनीय और कल्पना से परे होता है. श्रीमदभागवत में वेद व्यास महाराज अदभुत प्रकरण रखते है.  नैमीशरण में अठासी हजार ऋषि कथा का श्रवण कर रहे है. सूत जी के व्यास और शुकदेव जी शास्त्र व अध्यात्म के गुरू है. साध्वी मां कनकेश्वरी देवी ने कहा कि शास्त्रों का ज्ञान अनेक गुरूओं से प्राप्त किया जाता है. लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान कोई एक सद्गुरू ही से प्राप्त किया जा सकता है.

तत्व गुरू के द्वारा प्रदत्त आध्यात्म ज्ञान  के अभाव में शास्त्रों के श्लोकों का ज्ञान भी वजन लगता है. लेकिन जब आध्यात्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो शास्त्रों का ज्ञान सहज लगता है. श्रीमद भागवत कथा में पांच पांडव हमारी पांच इंद्रियां है जिनकी एक ही वृत्ति रूपी पत्नि द्रोपदी है. यानि पांडव की वृत्ति भगवान श्रीकृष्ण की ओर है जिसके कारण ही पांडव स्वर्गारोहण करते है. पांडव को भगवान श्रीकृष्ण पर अट्ट भरोसा है. इसलिए वे सुख में भी कृष्ण और दुख में भी कृष्ण ही भजते है. पांडव ने कभी नहीं कहा की हे भगवान हम पर कृपा करो. क्योकि पांडव, भगवान से ऐसा कहना भी भगवान पर अविश्वास करना मानते है.

Related Posts: