यू.पी.ए. सरकार के विरोधियों ने एफ.डी.आई. व डीजल रसोई गैस मूल्य वृद्धि के विरोध में ‘भारत बन्द’ किया और सरकार ने इसी दिन वैधानिक अधिसूचना जारी करके एफ.डी.आई. खोल दिया. इसी के साथ राजनैतिक घटनाचक्र भी तेजी से घूमने लगा. ममता बनर्जी की रौल बैक की शर्त भी नहीं मानी गई. इससे उन्होंने भी यू.पी.ए. सरकार व संगठन से अपना नाता खत्म कर दिया.

समाजवादी पार्टी के श्री मुलायम सिंह ने ‘समर्थन और विरोधÓ दोनों एक चलाने की राजनीति व रणनीति की नई विधा प्रारंभ कर दी. साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखना है इसलिए यू.पी.ए. सरकार समर्थन देकर गिरने नहीं देंगे. लेकिन वे सरकार की एफ.डी.आई. की डीजल रसोई गैस की नीतियों के खिलाफ हैं और विरोध भी करते रहेंगे. ‘चित भी मेरी पुट भी मेरी- अंटा उनके बाप काÓ. उनका अंटा है कि 2014 के चुनाव में उनकी शक्ति इतनी बढï जाये कि तीसरे मोर्चे की सरकार और वे उसके प्रधानमंत्री बनें.

भाजपा व एन.डी.ए. के नेता श्री आडवानी भी ऐसी संभावना व्यक्त कर चुके हैं कि अगले चुनाव में एन.डी.ए. व यू.पी.ए. दोनों ही सत्ता से वंचित हो सकते हैं और तीसरा मोर्चा सरकार बना ले. भाजपा इससे बौखला गयी और फौरन दावा किया कि एन.डी.ए. ही सत्ता में आयेगा. इस समय देश में सत्ता के दावेदार बढ़ते जा रहे हैं.

एक नया समीकरण यह भी बनने की संभावना है कि ओडीसा की बीजू जनता दल के मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक जो काफी पहले भारतीय जनता पार्टी से अपना संबंध तोड़ चुके हैं. वे यू.पी.ए. का अंग बन जाये. ममता के यू.पी.ए. छोडऩे से वामपंथी यह अवसर चाहेंगे कि वे यू.पी.ए. में वापस आ जायें. वे यू.पी.ए. प्रथम सरकार में उनके साथ थे और भारत-अमेरिका परमाणु ऊर्जा संधि में यू.पी.ए. से समर्थन वापस ले बाहर आ गये थे. उसके बाद के चुनावों में वामपंथियों की भारी पराजय हो गयी थी और ममता की तृणमूल के हाथों पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार भी चली गई. अब वापसी में ही उनकी खैरियत है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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