अनेक बम्पर फसलों के मध्य प्रदेश में बिजली की कमी के साथ एक और अभाव की स्थिति कृषि क्षेत्र में रासायनिक खादों की है. जैसे अभी गेहूं उपार्जन के समय बोरों के अभाव को लेकर राज्य की केंद्र से टकराहट होती रही. उसी तरह इससे पूर्व राज्य और केंद्र के बीच खाद का बराबर आवंटन न मिलने से खाद विवाद भी चलता रहा. इस बार किसानों ने बोरे लूटे. उस बार किसानों ने यूरिया लूटा था. संभवत: इसी से नसीहत लेकर इस बार राज्य शासन ने खादों की मार्कफेड में अग्रिम भंडारण कर लिया है. यह निर्धारित लक्ष्य 5 लाख मीट्रिक टन के विरुद्घ 6 लाख 6 हजार मीट्रिक टन है. इसमें से सहकारी समितियों को 3 लाख 20 हजार मीट्रिक टन खाद पहुंचाया जा चुका है.

अभी भी मार्कफेड के पास 2 लाख 86 हजार मीट्रिक टन खाद मौजूद हैं. इससे खरीफ के किसानों को खाद का अभाव नहीं होगा, लेकिन इस बार पोटास खाद का अभाव हो सकता है और देश व राज्यों को उसकी वैकल्पिक व्यवस्था कर लेनी चाहिये. लीबिया और सीरिया से ही भारत पोटास रासायनिक खाद खरीदता रहा है. इन दोनों देशों में राजनैतिक विद्रोह व संघर्ष की स्थिति के कारण पोटास आना बन्द हो गया है. केन्द्र पोटास के वैकल्पिक राष्ट्रों की तलाश में लगा है.

मध्यप्रदेश देश में सोयाबीन उत्पादन में प्रथम होने के कारण इसे सोया राज्य का दर्जा दिया गया है, लेकिन इस बार राज्य में सोयाबीन की पैदावार कम होने के कारण राज्य में सोयाबीन के बीज का संकट पैदा हो गया है. राज्य शासन के बीज निगम के पास इस समय 70 हजार क्विंटल बीज ही है जबकि आवश्यकता इससे कहीं ज्यादा है. इस बात के प्रयास जारी हैं कि आवश्यकता पडऩे पर कहां-कहां से सोयाबीन बीज प्राप्त किया जा सकता है. मध्यप्रदेश शासन काफी पहले ही यह घोषित कर चुका है कि उसका ध्येय राज्य को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती पर लाकर राज्य को सम्पूर्ण रूप से जैविक खेती का बनाना है. लेकिन इतने बड़े लक्ष्य की तैयारी बहुत ही छोटी है जो नजर ही नहीं आती है. सरकार को जैविक खेती का प्लान घोषित कर देना चाहिए.

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