कैलिफोर्निया की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने एक ऐसा कंप्यूटर प्रोग्राम विकसित किया है, जो यह बता सकता है कि आपके मन में क्या चल रहा है. वैज्ञानिक माइकल ग्रेसियस के नेतृत्व में रिसर्चरों की टीम ने फंक्शनल मेग्नेटिक रेसोनेन्स इमेजिंग (एफएमआरआई) तकनीक के जरिये 14 वॉलंटियरों के मस्तिष्क की स्केनिंग की. इसका उद्देश्य विभिन्न मनोदशाओं के दौरान मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले अलग-अलग पैटर्न को पहचानना था

वॉलंटियरों को चार में से एक काम चुनने को कहा गया. ये थे – मन ही मन कोई गीत गाना, उलटी गिनती करना, दिन की घटनाएं याद करना या आराम करना. इनके लिए 10 मिनट थे, जिसके बाद उनके मस्तिष्क स्कैन किए गए. कंप्यूटर प्रोग्राम ने प्रत्येक कार्य से जुड़ी ब्रेन एक्टिविटी के विशिष्ट पैटर्न को पहचाना.इसके बाद ग्रेसियस की टीम ने 10 नए वॉलंटियरों से ये सब कार्य करने को कहा. आश्चर्य की बात यह थी कि कंप्यूटर प्रोग्राम ने इन वॉलंटियरों द्वारा किए जा रहे कार्यो में से 85 प्रतिशत को बिल्कुल सही पहचाना. ग्रेसियस के मुताबिक उनकी टीम नए लोगों के 40 स्कैनों में से 34 मनोदशाओं की सही पहचानने में सफल रही.

इस तकनीक के क्या फायदे हो सकते हैं? यदि हजारों मनोदशाओं के पैटर्न का एक रेफरेंस बैंक बनाया जाए तो इसका इस्तेमाल लोगों के विचार ‘पढऩे’ के लिए किया जा सकता है. कुछ लोग भविष्य में अपराध कबूल करवाने के लिए इस तकनीक के इस्तेमाल की वकालत कर सकते हैं. जाहिर है ऐसे प्रयोगों से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे उठेंगे, लेकिन इस तकनीक का तात्कालिक लाभ चिकित्सा क्षेत्र को मिल सकता है.

मस्तिष्क पढऩे के कई अनुसंधान चल रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के न्यूरोसाइंस एंड टेक्नोलॉजी इनोवेशन सेंटर के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के उन हिस्सों को खोजा है, जहां शब्दों का निर्माण होता है. एरिक लियुथार्ट के नेतृत्व में रिसर्चरों ने मस्तिष्क में इलैक्ट्रॉड प्रत्यारोपित करके यह पता लगाया कि उसमें उत्पन्न होने वाली हर ध्वनि का विशिष्ट सिग्नल होता है. इस आधार पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम विकसित किया जा सकता है, जो पता लगा सकता है कि व्यक्ति क्या कहना चाह रहा है. यह रिसर्च मूल रूप से मिर्गी के कारण खोजने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन रिसर्चरों ने मस्तिष्क के उन हिस्सों पर भी निगरानी रखी, जहां भाषा का निर्माण होता है. टीम ने मिर्गी से पीडि़त चार लोगों का अध्ययन किया. प्रत्येक व्यक्ति के सिर में 64 इलेक्ट्रोड्स फिट किए गए और उनसे कहा गया कि वे ‘ऊ’, ‘आह’, ‘इह’ और ‘ई’ ध्वनियों का उच्चारण बार-बार करें. फिर स्पीच निर्माण संबंधी सिग्नलों के लिए ब्रेन के ‘वेनिक’ और ‘ब्रोका’ हिस्सों पर निगरानी रखी. वह प्रत्येक ध्वनि के लिए एक विद्युत सिग्नल प्राप्त करने में सफल रहे. ये चार ध्वनियां वाक्य-निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इसे आगे संभव बनाया जा सकता है.

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