रुपये की हालत खराब है और इसकी हालत सुधारना ही सरकार के सामने बड़ी कार्यवाही व समस्या है. श्री प्रणव मुखर्जी के पदोन्नति के लिए जाने से वित्त विभाग फिलहाल प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के पास आ गया है. इससे कोई चमत्कार की आशा नहीं की जानी चाहिए. व्यवस्था वही बनी रहेगी. रुपये का मूल्य विश्व की सभी मुद्राओं में स्वतंत्र रूप से तय होता है. लेकिन धरातलीय यथार्थ यह है कि सभी मुद्राओं का मूल्यांकन डालर के हिसाब से होता है. विश्व बाजार में डालर का महत्व इस बात से सबसे ज्यादा स्थाई रूप से ऊंचा बना रहता है कि अरब के पेट्रो क्रूड उत्पादक देश उनकी खुद की मुद्रा को दरकिनार कर अमेरिकी डालर में क्रूड का मूल्य मांगते हैं.

रुपया डालर के मुकाबले 45 रुपया होना लंबे अरसे से मान्य मूल्यांकन रहा है. इसमें परिवर्तन 45 से 48 तक ही सामान्य माने जाते हैं. उसके बाद उसका गिरना अवमूल्यन कहलाने लगता है. इसका सीधा प्रभाव भारत के आयात-निर्यात पर पडऩे लगता है. इस साल रुपया डालर के मुकाबले 7 प्रतिशत गिरा है. कुल मिलाकर 30 प्रतिशत गिर चुका है. परेशानी यह है कि यह मूल्य लगातार गिरने से रुपया ही मुद्रा के रूप में अस्थिर हो गया है. जहां आयात महंगा होता जाता है वहीं निर्यातकों को लेने-देने में भाव निर्धारित करना मुश्किल हो रहा है. इस समय रुपया डालर के मुकाबले 57 रुपये 15 पैसे पर चल रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था एक दशक के निचले स्तर 5.3 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. विकास दर घटने से विदेशी निवेशकों ने भारतीय निवेश व्यापार से अपनी काफी पूंजी वापस निकाल ली है. इस समय सरकार के सामने सबसे बड़ी जरूरत है कि यूरो जोन के संकट से कैसे निपटा जाए और देश के शेयर बाजारों में विदेशी निवेशकों का विश्वास बहाल हो.

औद्योगिक मंदी इस हद तक पहुंच गई कि टाटा जैसे अग्रणी वाहन निर्माता ने जमशेदपुर स्थित वाहन संयंत्र को दो इकाइयों सहित बंद कर दिया. वाहन उत्पादन 1200 प्रति माह में गिरकर 550 पर आ गया. सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए बांडों में 10 अरब डालर की वृद्धि कर उसे 20 अरब डालर कर दिया है. देश में सोना में निवेश पर बहुत जोर हो गया है. इस वर्ष 62 अरब डालर का सोना आयात किया गया. अब सरकार यह तय करने जा रही है कि बैंकों द्वारा सोना बेचने पर पाबंदी लगा दी जाए. इससे सोना आयात घटने से व्यापार घाटा कम होगा और रुपये को मजबूती मिलेगी. सोना में निवेश सें बाजार में कार्य पूंजी की कमी हो जाती है और उसका पूरी आर्थिक गतिविधियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

जी-20 देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एस.एफ.) के मार्फत यूरो जोन को ऋण संकट से उबरने के लिये संयुक्त वित्तीय प्रयास किया है. भारत इसमें 40 अरब डालर दे रहा है, लेकिन यूरो जोन में संकट और गहरा गया है. जोन के सबसे समृद्ध जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने यूरो मंडल के कर्ज को साझा करने से इंकार कर दिया. इससे स्पेन व इटली को तगड़ा झटका लगा है. इसके साथ ही यूरो जोन के एक और राष्टï्र साइप्रस में भी ऋण संकट पैदा हो गया. भारत को यूरोप व अमेरिका के अलावा अपने निर्यात बाजार दूसरे देशों में तलाशना है. ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका- ब्रिक्स संगठन बनाकर इस दिशा में बड़े प्रयास कर रहे हैं. वे डालर की प्रभुता से बचने का विकल्प बना रहे हैं.

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