लोकपाल को लेकर

नई दिल्ली, 3 जनवरी. संसद के शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक के पारित न होने को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी [भाजपा] के बीच जुबानी जंग अब और तेज हो गई है. दोनों पार्टियों में इसके लिए एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण करने का सिलसिला जारी है.

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा ने लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का समर्थन इसलिए नहीं किया, क्योंकि यह राहुल गांधी का विचार था. वहीं भाजपा ने इस पूरे प्रकरण के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चुप्पी साधे रखने पर सवाल उठाए. कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि भाजपा लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने पर समर्थन नहीं करने के लिए झूठे व आधारहीन तर्क दे रही है. सिंघवी ने कहा कि भाजपा ने स्थाई समिति में लिखित में कहा था कि हम बिना शर्त लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का समर्थन करते हैं. सर्वदलीय बैठक में भी उसने यह बात कही थी.

उन्होंने कहा कि लेकिन लोकसभा में अचानक इसकी विशेषताओं पर ध्यान दिए बगैर इसे लेकर अर्थहीन तर्क दिए जाने लगे, क्योंकि इसका विचार राहुल गांधी ने दिया था. मुझे बताइये कि संविधान संशोधन तथा लोकायुक्त में क्या सम्बंध है? उल्लेखनीय है कि भाजपा ने उसी स्थिति में विधेयक को समर्थन देने की बात कही थी जब संविधान के अनुछेद 252 के तहत लोकायुक्त का गठन किया जाएगा. संविधान का यह अनुछेद रायों को कानून बनाने के मामले में अधिक स्वतंत्रता देता है. कांग्रेस के एक अन्य प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भाजपा पर नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि वह देश में अविश्वास का माहौल खड़ा कर रही है. उन्होंने कहा कि लोकसभा से पारित हुए लोकपाल विधेयक का यदि भाजपा ने समर्थन किया होता तो आसमान नहीं टूट पड़ता. यदि इसमें थोड़ी बहुत खामियां थी तो संसद के पास इस पर विचार करने का पूरा अधिकार है.

उन्होंने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि वर्ष 2011 में भाजपा ने जो नकारात्मक राजनीति की वह उसे 2012 में नहीं दोहराएगी. भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने पार्टी मुख्यालय में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि लोकसभा में लोकपाल पर चली बहस के दौरान प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया लेकिन रायसभा में उन्होंने क्यों चुप्पी साधे रखी. जबकि वह रायसभा में सदन के नेता हैं. क्या यह उनकी राजनीतिक मजबूरी थी. प्रसाद ने विपक्ष द्वारा संशोधनों पर अड़े रहने का बचाव करते हुए कहा कि संशोधन देना हमारा अधिकार है. यदि एक सांसद ने एक संशोधन दिया होता तो कुल संशोधनों की संख्या कम से कम 250 होती.

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