मध्यप्रदेश कांग्रेस ने जेल भरो आंदोलन से राज्य में अपनी सक्रियता जाहिर कर दी है. एक लंबे अरसे तक पार्टी में सुस्ती नजर आ रही थी. श्रीमती जमुनादेवी के निधन के बाद नेता विपक्ष का पद खाली रहा. श्री अजय सिंह ‘राहुल’ ने पद संभालने के बाद अविश्वास प्रस्ताव से सक्रियता दिखायी. प्रदेश अध्यक्ष श्री कांतिलाल भूरिया ने इस जेल भरो आंदोलन उनके गृह जिले झाबुआ से सर्वाधिक गिरफ्तारियां लगभग 38 हजार दिलाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दिया. ऐसे आंदोलनों में सरकार व आंदोलन वाली पार्टी के दावों में फर्क चलता ही रहता है. सरकार कह रही है कि सवा लाख लोगों ने गिरफ्तारियां दी हैं जबकि कांग्रेस का दावा है कि 5 लाख लोग गिरफ्तार किए गये हैं.

आजादी के कुछ समय बाद प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने मत व्यक्त किया था कि स्वतंत्र देश में जेल जाने वाले आंदोलन प्रासंगिक नहीं है. विचारों के आंदोलन चलने चाहिए. लेकिन आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के अनशन और कांग्रेस के जेल जाओ आंदोलन आज सभी पार्टियों का चाल चलन बन गए हैं. लेकिन इनमें बहुत विकृति आ गई है. लगभग सभी आंदोलन हिंसात्मक तोडफ़ोड़ व जबरिया बाजार बंद कराने के हो गए हैं. अब तो यह विकृति बढ़कर रेल रोको- सड़क रोको, यातायायात रोको बन गई है. रैलियां व प्रदर्शन, हुड़दंग व हुल्लड़ ही होते हैं. रैली वाले रेलों पर कब्जा कर लेते हैं. लेकिन इस समय राज्य में कांग्रेस का जो जेल भरो आंदोलन चला उसमें यह उल्लेखनीय है कि इसमें हिंसा, तोडफ़ोड़, हुल्लड़ नहीं हुई. शालीनता ही नजर आई. इसकी शुरुआत दिल्ली में अन्ना के अप्रैल अनशन में हुई. इतना बड़ा अनशन आंदोलन राजनैतिक शालीनता से ही चला था.

यदि अब सभी राजनैतिक आंदोलन में यह रंग ढंग कायम रहे तो वह निश्चित ही जनहित की राजनीति होगी. इस बार भोपाल या अन्य नगरों में इस बड़े आंदोलन के कारण सड़क यातायात बहुत बाधित हुआ. लोगों को काफी परेशानी हुई. लेकिन ऐसा सिर्फ इसी बार नहीं हुआ है. इससे पूर्व भी भारतीय युवा जनता मोर्चा, किसान प्रदर्शन व गैस पीडि़तों के प्रदर्शनों में भी हुआ है. एक बार शिक्षकों के गुरुजन धरना आंदोलन में एक हफ्ते भोपाल में टी.टी. नगर का मुख्य मार्ग बंद हो गया था. अब रैलियों, प्रदर्शनों, आंदोलन के बारे में राजनैतिक दलों को संयम आचरण के प्रदर्शन करना चाहिए. जिससे नागरिक जीवन प्रभावित न हो. अदालते भी इसे रोकने में आगे आयी हैं. ‘मुंबई बंद’ के लिये हाईकोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी व शिवसेना पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था.

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