मध्य प्रदेश में आरक्षक भर्ती गिरोह के भण्डाफोड ने एक बार फिर सबको चौंका दिया है. पुलिस महकमे में भर्ती घोटाले के पीछे कितना बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था, तब यह सवाल भी लाजमी है कि अन्य भर्तियों में आखिर क्या होता होगा? अभी जो प्रारंभिक आकलन में बात सामने आई है, उसमें करीब 450 परीक्षार्थियों को पास कराने का ठेका बकायदा एक गिरोह के हाथ में था. प्रत्येक आवेदक से चार-चार लाख रुपये लिये गये थे. आश्चर्य की बात यह है कि गिरोह के कर्ता-धर्ता का ताल्लुक बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से है. परीक्षा के दौरान 45 ‘मुन्ना भाई’ पकड़ï भी गये. गिरोह का खुलासा भी इन्हीं से पूछताछ के बाद हुआ है.

दरअसल इसके पहले भी पीएमटी व अन्य परीक्षाओं में इस तरह के फर्जी परीक्षार्थी पकड़े गये थे, लेकिन पुलिस महकमे की भर्ती में ही इस तरह का बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा करना पुलिस की आंख से काजल चुराने की कहावत को चरितार्थ करता है. लेकिन इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि व्यावसायिक परीक्षा मंडल के कारिंदों की भी इसमें मिलीभगत हो सकती है. लिखित परीक्षा के बाद आगे की परीक्षाओं में भी उत्तीर्ण कराने में पुलिस महकमे की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता है. परीक्षा के दौरान जो दिलचस्प मामले सामने आए हैं उसमें कोई ‘मुन्ना भाई’ अपने चाचा को पास कराने के लिए उसके लिए कॉपी लिख रहा था तो कोई पैसे लेकर पूरी तरह से फर्जी उम्मीदवार बन परीक्षा दे रहा था. सरकार और प्रशासन के लिए यह एक सबक है कि आगामी समय में होने वाली इस तरह की महत्वपूर्ण परीक्षाओं के लिए फर्जीवाड़े के पूर्व ही योजना स्तर पर ही बदमाशों को पकड़ लें. इसके बाद भी हर स्तर पर चेकिंग प्रणाली इतनी सख्त कर दें कि कोई भी फर्जी परीक्षार्थी ऐसा न कर सके. इसके लिए आवेदन की जांच-पड़ताल और सावधानी-पूर्वक करनी होगी तथा कड़े नियम बनाने होंगे. नियमों में भी कुछ बदलाव करने होंगे. यह तो लिखित परीक्षा की बात है.

असली भ्रष्टाचार तो इंटरव्यू तथा भौतिक सत्यापन के दौरान होता है. इस पर भी रोक लगाने की जरूरत है. लेकिन इस ताजा प्रसंग में मध्यप्रदेश पुलिस तथा एसटीएफ साधुवाद की पात्र हैं जिन्होंने न केवल ‘मुन्नाभाईयों’ को पकड़ा अपितु एक बड़े गिरोह का भी भंडाफोड़ कर दिया. फर्जीवाड़े को पकडऩा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि लाखों रुपये देकर तंग में आए लोग भ्रष्टïाचार और कदाचरण से फिर वसूली प्रारंभ कर देते हैं.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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