संविधान में जो पद उल्लेखित हैं वे सभी संवैधानिक पद होते हैं. इनमें से कुछ चुने जाते हैं, कुछ सरकारों द्वारा नामांकित होते हैं और कुछ पदों पर नियुक्तियां होती हैं, जिन्हें सरकार नियुक्त करती है. इनमें केंद्रीय स्तर पर कुछ ऐसी नियुक्तियां हैं जो राष्टï्रीय स्तर पर बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. उनका कुछ हद तक सरकार पर नियंत्रण रहता है. संविधान ने तो इन पदों को शक्ति प्रदान की है, लेकिन भूतपूर्व केंद्रीय चुनाव आयुक्त श्री टी.एन. शेषन ने उनमें अकेले दम पर यह चेतना जगा दी कि इन पदों के लोगों को किस साहस व शक्ति से काम करना चाहिए.

संवैधानिक पदों पर सरकार द्वारा नियुक्ति वाले 4 पद अति महत्वपूर्ण हैं- (1) मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य आयुक्त (2) नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (3) केंद्रीय सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्त (4) केंद्रीय सतर्कता आयुक्त. इनमें से पहले दो मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त और नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की नियुक्तियां प्रधानमंत्री अपने विवेक से शासकीय अधिकारियों में से करते हैं. लेकिन सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) और सूचना के अधिकार के तहत मुख्य सूचना आयुक्त व अन्य आयुक्तों की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विधि मंत्री व नेता विरोधी दल का कालेजियम इनकी अनुशंसा करता है. इसे मानना सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है.

सी.वी.सी. (मुख्य सतर्कता आयुक्त) श्री पी.वी. थामस की नियुक्ति पर नेता विरोधी दल श्रीमती सुषमा स्वराज ने यह आपत्ति की थी कि श्री थामस का उस समय का रिकार्ड ठीक नहीं है, जब वे केरल में आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में पदस्थ थे, लेकिन श्रीमती सुषमा स्वराज की आपत्ति को सरकार ने नहीं माना और श्री थामस को नियुक्त कर दिया. इस नियुक्ति पर बड़ा बवाल मचा और आखिर में सर्वोच्च न्यायालय ने श्री थामस की नियुक्ति को गलत माना और उन्हें हटाने का आदेश दिया. राष्ट्रपति ने उन्हें पद से हटा दिया. इससे प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह सरकार की बड़ी किरकिरी हो गई.

भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री लालकृष्ण आडïवाणी ने सुझाव दिया है कि संविधान में परिवर्तन कर मुख्य चुनाव आयुक्त व नियंत्रक महालेखा परीक्षक की नियुक्तियों के लिये एक कालेजियम बनाया जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, केन्द्रीय विधि मंत्री, गृह मंत्री के अलावा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व संसद के दोनों सदनों के नेता विपक्ष को भी शामिल किया जाए.

श्री आडवाणी का सुझाव स्वागत योग्य है. चुनाव आयुक्तों व सी.ए.जी. का पद सार्वजनिक व राजनैतिक दृष्टिï से अति महत्वपूर्ण है. अत: इस पर कालेजियम बनाना उचित ही होगा. लेकिन इसमें केन्द्र सरकार की गरिमा का भी समावेश होना चाहिए. कालेजियम कोई निर्णय न ले बल्कि शासन को किसी नाम या पैनल की अनुशंसा करे और उस पर निर्णय सरकार का ही अंतिम होना चाहिए.

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