भारत सरकार में एक अर्से से ”निर्यात बंद और निर्यात खोलो” का तमाशा चल रहा है.  संबंधित मंत्रालयों और मंत्रियों में एक-दूसरे का इस मुद्दे पर विरोध भी चलता जा रहा है. इससे देश में ऐसी वस्तुओं के भाव कभी भी स्थिर नहीं हो पाते. हर वक्त एक सी ही दलील दी जाती कि अमुक वस्तु का उत्पादन बढ़ गया है और देश में इसके भाव गिर रहे है. इसलिऐ निर्यात खोला जाए. या फिर यह दलील दी जाती है कि इस समय विदेशी बाजारों में अमुक वस्तु के भाव ऊंचे चल रहे हैं उसका फायदा उठाया जाए. इन विवादों में एक मंत्री श्री शरद पवार ‘कामन’ रहते है और आयात-निर्यात भी शगूफा बना रहता है.

भारत दुनिया में कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है. अमेरिका कपास उत्पादन में प्रथम है. भारत के कपास का सबसे बड़ा निर्यातक चीन है. क्योंकि बहुत ही नजदीक होने के कारण उसे भारतीय कपास अमेरिकी कपास से बहुत सस्ता पड़ता है. गत सितंबर माह तक भारत लगभग 12 लाख मिलीयन गठान कपास का निर्यात कर चुका है. स्थिति ऐसी निर्मित होने लगी कि देश की कपड़ा व सूत मिलों को कपास का अभाव हो जायेगा. देश में कपड़े का उत्पादन काफी गिर सकता है. जिसमें रेडीमेड कपड़ों के व्यापार व निर्यात पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा. इस स्थिति मेंं वाणिज्य मंत्रालय व वाणिज्य मंत्री श्री आनंद शर्मा ने कपास निर्यात रोक दिया. लेकिन कृषि मंत्री श्री पवार के विरोध के कारण अब यह निर्यात खोल किया.
नतीजा यही होना है कि निर्यात शुरु होने से पहले ही देश में कपास के भाव बढ़ जायेंगे. घोषणा होते ही देश में परिष्कृत कपास प्रति केन्डी (365 किलो) के भाव एक हजार रुपये और कच्ची कपास के भाव 3800 से 4000 रुपये क्विंटल हो गए. अभी कपास का समर्थन मूल्य 4200 रुपये है और किसान इसे 6000 रुपये करने की मांग कर रहे हैं. चीन अपनी जरूरत की कपास अमेरिका से खरीद चुका है और भारत का निर्यात बंगलादेश को हो सकता है.
चालू सत्र में कपास का उत्पादन 352 लाख गांठ हो सकता है और हमारी घरेलू खपत 260 लाख गांठ अनुमानित है. निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से पहले ही 130 लाख गांठ कपास निर्यात किया जा चुका था और हमारी जरूरत से भी कम 222 लाख गठान बचा था इसलिये निर्यात को फौरी तौर पर बन्द कर दिया गया था.

अब यदि श्री शरद पवार की वजह से कपास का और ज्यादा निर्यात कर दिया गया तो देश की मिलों व लूम के लिये कपास की कमी हो जायेगी और वह महंगी हो जायेगी. कपास की तरह भारत शक्कर में भी दुनिया का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है लेकिन शक्कर की खपत में दुनिया का पहला राष्ट्र है. हमारा शक्कर उत्पादन अच्छी गन्ना पैदावार में अपनी जरूरत से कुछ ही लाख टन ज्यादा रहता है. जब भी शक्कर का निर्यात खोला जाता है देश में शक्कर की कीमतों में एकदम से उछाल आ जाता है. प्याज में भी यही हाल है. निर्यात खोलते ही देश में इसका अभाव और मूल्यवद्धि हो जाती है. सरकार को ऐसी जरूरी वस्तुओं में केवल उतना निर्यात ही खोलना चाहिए जो हमारी खुद की जरूरत से अधिक हो. अन्यथा दूसरे हमारा माल खाते हैं और हम महंगाई की मार खाते हैं.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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