उत्तरी राज्यों और पश्चिमी व दक्षिणी राज्यों की शकर  मिलों के बीच मतभेद पहली बार सतह पर  आ गए हैं

नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें मसलन बिड़ला, द्वारिकेश, उत्तम और डीसीएम श्रीराम समेत कुछ अन्य मिलें सरकार के संभावित कदम का विरोध कर रही हैं जिसमें सरकार ने हाल में मंजूर 10 लाख टन चीनी के निर्यात में कोटा आवंटन की प्रक्रिया  समाप्त करने की बात कही है।

अब सरकार पहले आओ पहले पाओ के आधार पर मिलों को निर्यात का कोटा आवंटित कर सकती है, जिससे तटीय इलाके की मिलों को फायदा होगा। इन कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुरुवार को खाद्य मंत्री के वी थॉमस से मुलाकात की और कोटा आवंटन की पुरानी प्रक्रिया जारी रखने पर जोर दिया। उनका कहना था कि पुरानी प्रक्रिया से सभी मिलों को फायदा होगा, न कि सिर्फ तटीय इलाके की मिलों को।

इन कंपनियों का दावा है कि इस कदम से उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा और बिहार की चीनी मिलों को भारी नुकसान होगा, जो बंदरगाह से दूर होने के चलते सीधे चीनी निर्यात में मुश्किलों से दो-चार होती हैं। मंत्री से मुलाकात करने वाले एक अधिकारी ने कहा  हमने मंत्री से कहा है कि निर्यात की मंजूरी का फायदा पूरे उद्योग को होना चाहिए और इसके लिए कोटा व्यवस्था जारी रहना चाहिए।

चीनी उद्योग में नकदी प्रवाह सुधारने और गन्ना किसानों के बकाये में कमी लाने के लिए सोमवार को सरकार ने 10 लाख टन चीनी निर्यात की मंजूरी दी थी। यह कोटा कुछ महीने पहले मंजूर किए गए 20 लाख टन के अतिरिक्त है। निर्यात की प्रक्रिया पर हालांकि अभी काम चल रहा है। वैसे बाजार में इस तरह की खबरें हैं कि चीनी निर्यात की मौजूदा मंजूरी में पिछले साल के उत्पादन के हिसाब से कोटा आवंटन की प्रक्रिया समाप्त कर दी गई है। यह पहले मंजूर किए गए 20 लाख टन चीनी निर्यात के नियमों से अलग है। सीधे निर्यात करने में परेशानी महसूस करने वाली इनमें से कुछ मिलें अपना कोटा महाराष्ट्र व दक्षिणी राज्यों को बेच चुकी हैं और उनसे 2500 से 3000 रुपये प्रति टन के हिसाब से प्रीमियम वसूल रही हैं।

इस हफ्ते की शुरुआत में खाद्य सचिव बी सी गुप्ता को लिखे पत्र में द्वारिकेश शुगर के सीएमडी जी आर मोरारका ने कहा है – हम यह जानकर व्यथित हुए हैं कि निर्यात कोटा आवंटन की मौजूदा नीति हालिया निर्यात मंजूरी में जारी नहीं रहेगी और इसमें पहले आओ पहले पाओ की नीति लागू करने का प्रस्ताव है। अगर ऐसा होता है तो बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की चीनी मिलों को भारी नुकसान होगा, जो बंदरगाह से दूरी के चलते सीधे निर्यात करने में सक्षम नहीं है। कोटा आवंटन की मौजूदा नीति के तहत निर्यात में सुस्ती का तर्क मिलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए पेश किया है, जो चाहती हैं कि दूसरी चीनी मिलों की कीमत पर असाधारण मुनाफा कमाया जाए। उन्होंने कहा – सीधे निर्यात करने वालों को आयकर के लाभ, निर्यात लाभ आदि मिलते हैं और उनका स्टॉक भी बिक जाता है। इसके अलावा उनकी कार्यशील पूंजी का हित भी सधता है। अगर वे छोटा सा हिस्सा दूसरी मिलों के साथ साझा करें तो इसका शायद ही कोई असर पड़ेगा।

Related Posts: