भारत के बारे में बहुत पहले वैश्विक स्तर पर यह धारणा आम ही थी कि यह देश सांप-सपेरों, जादू-टोनों का देश है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू अर्वाचीन काल से प्रबल रहा है कि भारत वह देश है जहां छोटे-छोटे जीव-जन्तुओं  से लेकर बड़े जंगली जानवर तक देवी-देवताओं के साथ जुड़े हैं. वे लोक मान्यताओं में सम्मान पूजा-धार्मिक क्रियाओं में महत्व पाते रहे हैं.

यही हमारे धर्म का वैज्ञानिक और पर्र्यावरणीय पहलू रहा है. इसके पीछे मंशा यही थी कि समाज में यह संदेश जाए कि जैसे हम आराध्य की पूजा करते हैं वैसे ही उनसे जुड़े शेर, हाथी, मोर, कुत्ता, चूहा, सर्प, मगरमच्छ, मछली, कछुआ, कौवे से लगाकर अन्य छोटे- छोटे जीव जन्तुओं को समय-समय पर सम्मान भाव प्रकट करते रहते हैं. जैव-विविधता के संसार के प्रति यह भाव ही भारत का अनूठा और वैज्ञानिक दर्शन रहा है. इसका मुख्य मकसद भी पर्यावरण और जैव-विविधता संसार का संरक्षण करना रहा है. हम शेर पूजक समाज रहे हैं. इसका संदेश साफ है- यदि किसी क्षेत्र में शेर विचरण करते हैं तो समझिए समग्र पर्यावरण की दृष्टिï से वहां हालात अनुकूल हैं.

यह एक अच्छा संकेत है कि केंद्र सरकार अपनी एक पुरानी गलती सुधारने जा रही है. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्टï्रीय वन्य जीव बोर्ड की बैठक संपन्न हुई. पर्यावरण मंत्रालय के एक प्रस्ताव को इसमें हरी झंडी दी गई. इसमें कहा गया कि लुप्त प्राय: छोटे वन्य जीव-जंतुओं का पर्याप्त संरक्षण योजना बनाकर किया जाये. इस तरह के 57 जीवों की सूची तैयार की गई है. इसमें पक्षी, कीड़े-मकौड़े, मछलियां, जलचर-थलचर व अन्य जंतु शामिल हैं. इनका प्रजाति पुनर्वास कार्यक्रम भी तैयार किया गया है. सरकार से अपेक्षा है कि इस कार्यक्रम को क्रियान्वयन स्तर पर भी शीघ्र लागू करवाकर पारिस्थितिकी तंत्र की हर कड़ी का संरक्षण किया जाये. इसके लिये क्षेत्र स्तर पर अलग-अलग योजनाएं बनानी होंगी.
केवल जैव विविधता का ही संरक्षण नहीं- अपितु इनसे जुड़ी अन्य परंपराओं व लोक मान्यताओं का संरक्षण और नई पीढ़ी के बीच फैलाव भी जरूरी है. ताकि वे यह जान सकें कि भारत के दर्शन में विज्ञान तथा पर्यावरण पक्ष अहम्ï रहे हैं और इस सब पर अमल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती प्रदान करेगा. इसके साथ ही जैव-विविधता से जुड़ी कहावतें- लोकमान्यताओं को भी प्रकाश में पुन: लाया जाना चाहिये.

मध्य प्रदेश के संदर्भ में देखें तो नर्मदा नदी को समर्पित आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित नर्मदा अष्टïक तो नर्मदा जी के इकोलॉजिकल सिस्टम के संरक्षण का ही इशारा करता है. मछलियां, कछुए, मगरमच्छ, पक्षियों का कलरव- इसके मुख्य विषय हैं, लेकिन अफसोस की बात है कि नर्मदा में मगरमच्छ, मछलियां और कछुओं के जीवन पर गहरा संकट छा रहा है. कभी इस नदी की पहचान रही महाशीरा मछली तो लुप्त ही हो रही है. इसलिये वन्य प्राणियों के समग्र संरक्षण के लिये आवश्यक है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों- पर्वत, जंगल, नदियां, नालों के भी संरक्षण का माहौल बने. ये संसाधन ही मानव तथा अन्य जीव-जंतुओं के जीवन का बुनियादी आधार है.

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