मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने देश की एक अति गंभीर समस्या पर ‘बेटी बचाओ अभियान विजयादशमी पर्व से प्रारंभ किया है. कामना यही की जाती है कि ईश्वर की कृपा व राज्य की जनता उन्हें इस मानवीय संवेदना के अभियान में सफलता प्रदान करे.  स्त्री-पुरुष की जनसंख्या में दोनों में बराबरी का संतुलन प्रकृति का आदेश है. यदि यह संतुलन एकतरफा हो गया तो मानव जाति ही कई पशु-पक्षियों की तरह विलुप्त प्रजाति हो जायेगी.

राज्य के उत्तरी जिलों भिंड व मुरैना में बालिका अनुपात काफी नीचे जा रहा है. किसी भी क्षेत्र में प्रकृति की अवहेलना सर्वनाशी ही साबित होती है. लड़का-लड़की के जन्म में फर्क करना एक सामाजिक विकृत मानसिकता है. पंजाब में भी इसका घातक रूप चिन्ता का विषय बन चुका है. इस अभियान को आम जनता केवल शासकीय अभियान न माने बल्कि स्वयं आगे आकर इस अभियान को अपना अभियान बनायें. इस अभियान को सतत दिन-प्रतिदिन पूरी गंभीरता व लिप्तता के साथ चलाया जाए. इस अभियान की कोई अवधि नहीं हो सकती और न ही इसे अन्य सरकारी कार्यक्रमों की तरह रस्मी बनाना है.

देश में न जाने कितने ‘दिवस’ ‘सप्ताह’ ‘पखवाड़ा’ किसी न किसी विषय पर चलते जा रहे हैं. अधिकांश एक शासकीय औपचारिकता बने हुए हैं. सन् 50 के दशक में केन्द्रीय वन मंत्री श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी ने ‘वन महोत्सव’ को जंगलों को बचाने व लगाने के लिये प्रारंभ किया था. लेकिन जंगल कटते ही गये और कटते ही जा रहे हैं. मलेरिया उन्मूलन भी एक लम्बे अर्से से चल रहा है. मलेरिया तो मिटा नहीं बल्कि उसका बड़ा स्वरूप डेन्गू, चिकनगुनिया, दिमागी बुखार के रूप में आ गया. मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम बैठा मक्खी मार रहा है और मच्छर तक मर नहीं रहा. टी.बी. केवल दवाई बांटने से नहीं मिटेगी. गरीबी और गंदगी में इसका स्रोत है. इसे जड़ से मिटाना है तो इसकी जड़ को खत्म करना होगा. पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम में एक बात बहुत ठीक नजर आ रही है कि इसे लगातार पूरी ताकत से चलाया जा रहा है. वन महोत्सव तो हर साल मना पर जंगल कटते गये. इसका कारण तो स्पष्टï है कि यह महोत्सव जनता का महोत्सव नहीं बन सका. अब यह देखने में आ रहा है कि जंगल तो कट गये केवल महोत्सव ही बचा है और उसे ही मनाते जा रहे हैं.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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