Maruti Suzuki और Hyudai जैसी कंपनियों के कारखानों से दूर देश के कुछ कोनों में कुछ खास कार निर्माता मोटर स्पोर्ट्स को लेकर बढ़ी दिलचस्पी को भुनाने की तैयारी में हैं. दक्षिण भारत में कोयंबटूर की जयेम ऑटोमोटिव ने 1939 में अपना पहला देसी इलेक्ट्रिक मोटर बनाया था. अब यह कंपनी स्पोर्ट्स कारें बनाना चाहती है. उसे रेसिंग कारें बनाने वाली इटली की कंपनी डल्लारा से गठजोड़ होने की उम्मीद है

अलग-अलग मोटर रेसिंग फॉर्म्युले की गाडिय़ों के डिजाइन और निर्माण के लिए बातचीत चल रही है. कोयंबटूर की यह कंपनी देश में पिछले एक दशक से मोटर स्पोर्ट्स के कारोबार की मुख्य खिलाड़ी है. यह एमआरएफ की तरह मोटर रेसिंग जैसे कार्यक्रम का भी आयोजन कराती है। टाटा मोटर्स की इंडिगो के इंजन को अतिरिक्त टार्क से लैस करने के पीछे इसी कंपनी का हाथ है. इन इंजनों को बाद में रैली कारों में लगाया गया. गोवा की सैन मोटर्स साल 2000 से ही दो सीटों की स्पोर्ट्स कनवर्टिबल बना रही है. दो दरवाजों वाली इस कार में 1.2 लीटर इंजन क्षमता है और इसकी कीमत छह लाख रुपए है.

हालांकि, यह मोटर रेसिंग कार ज्यादा सफल नहीं रही, क्योंकि एक माह में सिर्फ 2-3 कारों की बिक्री हो पाती थी। इसे देखते हुए कंपनी अब दो सीटों के पावरफुल कनवर्टिबल मॉडल पर काम कर रही है। सैन मोटर्स अपनी कारों के इंजन रेनॉ से खरीदती है जबकि पैनल और बॉडी बेंगलुरु की अपनी फैक्टरी में बनाती है. बिक्री बढ़ाने के लिए यह देशभर में डीलरशिप में विस्तार करने की योजना बना रही है. ऐसी कारों के प्रति आकर्षण को कुछ शब्दों में समेटते हुए शमा बोथे कहतीं हैं कि इन कारों को बनाना मुख्य धारा के कारोबार से कहीं अधिक जुनून का मामला होता है. अपने जर्मन पति गिडो बोथे के साथ मिलकर शमा ने चिंकारा मोटर्स की स्थापना की ताकि स्पोर्ट आधारित कॉन्सेप्ट कारें बनाई जा सकें.शुरुआत में हालांकि फंडिंग को लेकर कुछ अड़चनों के बाद अब कंपनी इस साल न्यू रोडस्टर की लॉन्चिंग पर काम कर रही है.

इस समय यह दो सीटों वाली रोडस्टर की खुदरा बिक्री करती है, जो लोटस सुपर 7 पर आधारित है। इसकी कीमत 26 लाख रुपए है. बोथे ने बताया कि यह कार ऑर्डर पर बनाई जाती है, जिसमें ग्राहक की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन में कुछ बदलाव किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि वेटिंग पीरियड कम से कम साढ़े पांच महीने का है.रोडस्टर की बिक्री के लिए चिंकारा मोटर्स की नजर खेल-कूद के शौकीनों पर रहती है और कंपनी सालभर में 2-3 रोडस्टर्स बेच लेती है. शमा ने कहा, भारत अभी बड़े स्तर पर स्पोर्ट्स कारों के उत्पादन के लिए तैयार नहीं हो सका है।ज् मोटर रेसिंग को लेकर कुछ अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रीमियर का है, जिसकी बनाई पद्मिनी को लोग अब भी याद करते हैं. हालांकि, भारतीय कार उद्योग में नई कंपनियों की आमद के बाद पद्मिनी कहीं पीछे छूट गई. एक साल पहले प्रीमियर ने एक मिनी स्पोटर्स यूटिलिटी वीइकल (एसयूवी) लॉन्च किया जो देश में इस श्रेणी की इकलौती कार है. प्रीमियर के मैनेजिंग डायरेक्टर मैत्रेय दोशी ने कहा, च्हम ऊंचे आउटसोर्सिंग मॉडल को अपनाते हैं और कम वॉल्यूम और कम निवेश पर भी कारोबार चलाए रखना चाहते हैं. पुणे की यह कार कंपनी घरेलू बाजार से 35 फीसदी कल-पुर्जे खरीदती है और बाकी पुर्जे कम कीमत पर चीन से खरीदती है.

लॉन्चिंग के बाद से कंपनी 2,000 रियोज की बिक्री कर चुकी है. हालांकि 3,00,000 यूनिट्स वाले एसयूवी मार्केट की तुलना में प्रीमियर के कारों की बिक्री संख्या काफी कम है। देश की सबसे ज्यादा लोकप्रिय एसयूवी महिंद्रा स्कॉपिर्यो ने पिछले वित्त वर्ष में 44,000 यूनिट्स की बिक्री की थी. हालांकि खास तरह की कारें बनाने वालों की नजर अभी ऊंचे वॉल्यूम पर है भी नहीं. दोशी ने बताया, तीन साल में 15,000-17,000 यूनिट्स का आंकड़ा पार करने का हमारा इरादा नहीं है.

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