छतरपुर. 30 अक्टूबर. नससे. मनरेगा और शिक्षा विभाग की स्थिति  जमीनी  स्तर  बदहाल  बनी हुई है. आदिवासी दूरस्थ अंचलों में संचालित स्कूलों में साक्षरता  का  स्तर  निम्न  दर्जे  का है. यहां सुधार के नाम पर सिर्फ निर्देश  ही  दिए  जाते  हैं.

अभी तक आपने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 100 दिन का रोजगार मिलने का प्रचार-प्रसार सुना होगा लेकिन अब शिक्षा विभाग के  शासकीय स्कूलों में 100 दिन की शिक्षा ही बमुश्किल छात्रों को नसीब हो पा रही है. यह जानकारी नवभारत द्वारा किए गए सर्वे के  बाद प्रकाश में आई है.  बक्स्वाहा विकासखंड के पिछड़े ग्रामीण इलाकों में जब शिक्षा की स्थिति को जानना चाहा तो ग्रामीणों   ने बताया कि स्कूल सप्ताह में महज तीन-चार दिन ही खुलते हैं. इस दौरान बच्चों की परीक्षाएं ली जाती है और फिर बाद में शिक्षक लिखा-पढ़ी में व्यस्त देखे जाते हैं. प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं में छात्रों का मासिक और दक्षता मूल्यांकन टेस्ट होता है जिसमे लगभग 8 से 10 दिन का समय बीत जाता है. माह के शेष बचे दिनों में रविवार का अवकाश, तीज-त्यौहार और शिक्षकों की छुट्टी काटकर बच्चों की पढ़ाई हवा में होती है. इन परिस्थितियों में अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्ष के 365 दिनों में स्कूल कितने दिन खुलता होगा.

विद्यार्थियों की दक्षता की बात करें तो ऐसे अनेक छात्र है जिन्हें औपचारिक शिक्षा का ज्ञान नहीं है. आदिवासीछात्राओं सेे जब प्राथमिक ज्ञान के बारे में पूछा तो बच्चों ने कहा कि स्कूल में मास्टर पढ़ाते ही नहीं हैं इसलिए वे कुछ नहीं जानते. आदिवासी बाहुल्य किशनगढ़ इलाके के आदिवासी ग्राम नैगुवां, पाठापुर, सुकवाहा, बहरवारा, झरकुआ, टिपारी, नगदा, मतिपुरा आदि गांव के हालात भी शिक्षा के मामले में पिछड़े हैं. डीपीसी आरके शर्मा का कहना है कि सप्ताह में 45 घंटे अध्यापन कार्य शिक्षकों द्वारा कराया जाता है. उसी दौरान परीक्षाएं भी संचालित हो जाती हैं.

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