आंकड़ों में तो यह खबरें बराबर आती ही रहती हैं कि कृषि, उद्योग, व्यापार आदि में विकास दर बढ़ या घट रही है. उसका अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप व प्रभाव भी आकलन में लिया जाता है. जिसका सबसे ज्यादा संबंध आयात-निर्यात व्यापार से ही होता है. लेकिन विकास का सही पैमाना देश के आंतरिक साधनों से देश के उन लोगों का उत्थान या उन्हें प्रदान होता है जहां जिन्हें इसकी जरूरत है.

ऐसी विकास नीतियों का कोई अर्थ नहीं जो उन तक नहीं पहुंची जिनके लिये वह बनाई गई हैं. इन दलीलों में भी कोई औचित्य नहीं है कि योजना केन्द्र या राज्य में किसकी है, फन्ड किसका कितना है और क्रियान्वयन की जिम्मेवारी केन्द्र या राज्य किसकी है. ऐसी दलीलों से कुछ भी हासिल नहीं है सिवाय इसके जिम्मेदारी एक-दूसरे पर इसलिये थोपी जा रही है क्योंकि उससे सफलता से ज्यादा असफलता नजर आती है. मनरेगा केन्द्र की योजना है. इसमें फन्ड केन्द्र व राज्य दोनों का होता है, लेकिन इसका क्रियान्वयन एक ग्रामीण क्षेत्र में प्रोजेक्ट अधिकारी द्वारा किया जाता है. यदि वहां फर्जी जाब कार्ड, ठेकेदारी से काम हुए या काम नहीं हुए तो केन्द्र व राज्य की योजना व फन्ड दोनों व्यर्थ गये.

केरोसीन को भारी सब्सिडी के साथ गरीबों की जरूरत के लिये दिया जाता है. यदि वह ट्रकों, बसों व होटलों में प्रयोग व मिलावट में पाया जाए तो उस सब्सिडी का उपयोग ही उन लोगों ने किया जिनके लिये वह दी ही नहीं गई थी. गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली से यहां भी भारी सब्सिडी से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है. हाल ही और हमेशा भी ऐसे ट्रक पकड़े जाते हैं जो पीडीएस का अनाज आटा मिलों व अनाज व्यापारियों को पहुंचाते हैं. बाद में यही समर्थन मूल्य की खरीदी के समय बढ़े दामों पर सरकारी खरीदी केंद्रों पर बेच दिया जाता है.

यह सच है कि हर जगह केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारी नहीं बैठाये जा सकते. लेकिन यह भी शासन की जिम्मेवारी है और शासन भी इसे ही कहा जाता है कि शासन की व्यवस्था ऐसी बननी और रहनी चाहिए कि हर योजना का क्रियान्वयन सही रूप से ऐसा हो कि वह योजना और धन जिसके लिये दिया गया है उसका लाभ वहां तक पहुंचे. अन्यथा नौकरशाही के उच्च अधिकारी राज्य के कोष पर निरर्थक बोझ हैं. यदि वह व्यवस्था ही नहीं चला सकते हैं तो उच्च पदों व वेतन की जरूरत का ही कोई अर्थ नहीं है.

जहां व्यवस्था नहीं हो और भ्रष्टïाचार ही हो तो वहां विकास मात्र सरकारी प्रचार और कागजी रहेगा. एक उद्योगपति जो अपने उद्योग के बारे में सब कुछ जानता है, पूंजी लगाने के लिए तैयार बैठा है. उसके प्रोजेक्ट को एक ऐसा अधिकारी जांच-पड़ताल के नाम पर रोके रहता है जो उस उद्योग के बारे में कोई निपुण या विशेषज्ञ नहीं है. किसान को समर्थन मूल्य बढ़ाकर रुपया दिया और खादों व कीटनाशकों पर सब्सिडी कम करके उसके भाव 300 प्रतिशत तक बढ़ा दिये तो उससे कृषि क्षेत्र को लाभ के स्थान पर नुकसान ही हो गया. आज सबसे बड़ी जरूरत है कि कृषि क्षेत्र को खाद्यान्न की जरूरत के लिए और औद्योगिक क्षेत्र को रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा प्रोत्साहन सब्सिडी व कम ब्याज पर पूंजी पहुंचाने की है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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