भोपाल,27 अप्रैल,आदिम-जाति कल्याण राज्य मंत्री हरिशंकर खटीक ने कहा है कि विकास के साथ-साथ जन-जातीय संस्कृति का संरक्षण एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है.

मध्यप्रदेश की जन-जातीय संस्कृति अपनी विविधता के कारण सारे देश में एक अलग पहचान रखती है. संस्कृति से जुड़े विविध आयामों पर काम करने के लिये विषय-विशेषज्ञों की टीम जुटाकर प्रभावी तरीके से कार्य करने की जरूरत है. श्री खटीक आज प्रशासन अकादमी में जन-जातीय भाषाओं पर केन्द्रित दो दिवसीय सेमीनार को संबोधित कर रहे थे. इस मौके पर प्रोफेसर जगदीश चन्द्र शर्मा द्वारा तैयार की गई कोरकू व्याकरण का लोकार्पण किया गया. कार्यक्रम में आदिम-जाति अनुसंधान एवं विकास के संचालक श्री के. सुरेश मौजूद थे. राज्य मंत्री खटीक ने कहा कि जन-जातीय भाषाओं को बचाना इसलिये जरूरी है कि इनमें हजारों वर्ष का ज्ञान संचित है, वह चाहे जड़ी-बूटियों की जानकारी हो या शिल्प-कला अथवा सामाजिक मान्यताएँ. ये जन-जातीय भाषाएँ यदि लुप्त हो जाएँगी तो केवल ज्ञान ही नहीं मानव इतिहास के महत्वपूर्ण सूत्र भी खो जाएँगे.

उन्होंने कहा कि आदिम-जाति कल्याण विभाग द्वारा आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की दिशा में बेहतर प्रयास किये जा रहे हैं. जन-जातीय भाषा भिलाली के 5,500 शब्दों का संकलन किया गया है. 25 गोंडी मौखिक कथाओं का संकलन एवं हिन्दी अनुवाद किया गया है. भिलाली, गोंडी गीतों की पारम्परिक धुनों की ऑडियो-वीडियो रिकार्डिंग तैयार की गई है. प्रदेश के 78 जन-जातीय छात्रावासी विद्यार्थियों को आदिवासी कला के पारम्परिक नृत्य एवं संगीत का प्रशिक्षण दिलाया गया है. खटीक ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में जन-जातीय भाषाओं के सामुदायिक रेडियो केन्द्र शुरू किये जा रहे हैं. खालवा जिला खण्डवा में कोरकू और भाबरा जिला अलीराजपुर में भीली भाषा के सामुदायिक रेडियो केन्द्र प्रारंभ किये जा चुके हैं. स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी जन-नायकों के योगदान की चर्चा करते हुए श्री खटीक ने कहा कि टंट्या मामा, शंकरशाह और रघुनाथ शाह पर पुस्तकों के प्रकाशन के साथ ही उनके जीवन पर केन्द्रित फिल्म भी तैयार की गई है.

भारतीय भाषा संस्थान मैसूर के पूर्व उप निदेशक प्रो. जगदीश चन्द्र शर्मा ने कहा कि जन-जातीय भाषाओं को बचाना इसलिये जरूरी है कि इसमें हजारों साल के इतिहास का समावेश है. प्रत्येक जन-जातीय भाषा विविध ज्ञान से परिपूर्ण है. इन भाषाओं के इतिहास पर पुस्तकों के प्रकाशन की आवश्यकता है. उन्होंने मध्यप्रदेश में जन-जातीय भाषाओं पर किये जा रहे शोध की प्रशंसा की. कार्यक्रम का संचालन  लक्ष्मीनारायण पयोधि ने किया. शुभारंभ सत्र में सुखनंदन अहाके ने गोंडी एवं विक्रम सिंह बालके ने बारेली गीत प्रस्तुत किये. शुभारंभ सत्र के बाद नोरे एवं मदनमोहन शुक्ला ने गोंडी, केशर सिंह जामरा ने भिलाली भाषाओं पर शोध-पत्र पढ़े. जन-जातीय भाषा विशेषज्ञ डॉ. काकुली मुखर्जी ने सत्र की अध्यक्षता की.

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