अब डीजल के भावों पर संभवत: दो दिन बाद हमला होने वाला है- 4 से 5 रुपये तक बढ़ सकते हैं. पेट्रोल के भाव जो बढ़ते ही रहे हैं. इनका मूल्य नियंत्रण काफी पहले समाप्त हो चुका है और पेट्रो कंपनियां इसके भाव क्रूड के बाजार भाव के अनुसार बढ़ाने-घटाने के लिये स्वतंत्र हैं. लेकिन अभी डीजल, रसोई गैस और केरोसीन के मूल्य सरकारी नियंत्रण में हैं. अब ऐसी मांग होने लगी है कि डीजल को भी नियंत्रण मुक्त कर दिया जाए. देश में डीजल की खपत में इजाफा होता जा रहा है. पूरा यात्री व माल यातायात इस पर आ गया है.

तर्क यह है कि डीजल, पेट्रोल से सस्ता होने के कारण लोग डीजल वाहनों की तरफ जाने लगे हैं. जबकि सर्वेक्षणों में यह सिद्ध हो चुका है कि निजी वाहनों में डीजल खपत बहुत ही कम है. इसका 93 प्रतिशत भाग भारी यात्री व मालवाहक बसों व ट्रकों में लग रहा है. अब पेट्रोल के ट्रक व बसें खत्म हो चुकी हैं. रेलवे में कोयले के इंजिनों के बाद डीजल इंजिनों का युग आया था. अब वह शनै:-शनै: काफी हद तक बिजली के इंजिनों का हो गया है. केवल जिन सेक्शनों में जहां इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन नहीं बना है, उसी पर डीजल इंजिन चलते हैं. एक समय देश में कोयले का सबसे ज्यादा उपयोग रेलवे में ही होता था. अब वहां मांग खत्म हो जाने से वह पूरा कोयला ताप विद्युत गृहों व उद्योगों के लिए उपलब्ध है.

इस समय कोयला देश का सबसे ज्यादा उपयोग ऊर्जा स्रोत है. डीजल के भाव अब 4-5 रुपये बढऩे ही जा रहे हैं. देश को इस मूल्य आपदा के लिये तैयार रहना चाहिए कि माल व यात्री भाड़ा बढऩे से सभी वस्तुओं के मूल्यों में भारी उछाल आने वाला है. इस उछाल से ज्यादा उछाल मुद्रा स्फीति में आ जायेगा. रिजर्व बैंक कहता तो यही जा रहा है कि वह मुद्रा स्फीति को रोकने के लिये बैंक ब्याज दरों में कमी नहीं कर रहा है. यह उसी समय की जायेगी जब मुद्रा स्फीति कम होगी. अब यह मान लेना ही होगा कि न तो मुद्रा स्फीति घटने जा रही है और न ही रिजर्व बैंक बैंक रेट कम करने जा रहा है. उद्योगों के लिये पूंजी महंगी रहेगी और औद्योगिक उत्पादन दर भी कम ही रहेगी.

ऐसी विकट स्थिति पैदा हो उससे बेहतर यही रहेगा कि सरकार डीजल के भावों को वर्तमान रेट पर स्थिर रखे और इसे संपूर्ण राष्टï्र के लिये सब्सिडी मान लें. राज्यों को भी चाहिए कि वे भी डीजल पर सभी टैक्स खत्म करके राष्टï्रीय सब्सिडी में अपना योगदान मान लें. रिजर्व बैंक को अब यह सोचना ही छोड़ देना चाहिए कि कभी मुद्रा स्फीति कम होगी और वह बैंक रेट कम करेगा. उसे मुद्रा स्फीति और बैंक रेट को जोड़कर देखना खत्म करना होगा. तभी उद्योग जगत को राहत दे सकेगा. डीजल के भाव बढऩे का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव उद्योग जगत पर ही पडऩे जा रहा है. बढ़े बैंक रेट से उद्योग के लिये पूंजी महंगी है और डीजल के भाव बढऩे से औद्योगिक खर्च भी बढऩे जा रहा है. पूरा माल यातायात डीजल और उद्योगों पर ही निर्भर है. वह भी मुसीबत में आ जायेगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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