इतने बड़े भू-भाग के देश भारत में भाषा, भूषा, संस्कृति की विविधता के साथ जमीनों व मौसम में भी विविधता है. इन्हीं विविधताओं में हम अपने राष्ट की एकता भी ढूंढते हैं, लेकिन स्वाभाविक तौर से उन विविधताओं को स्वीकार भी करते हैं. देश में इस समय वर्षा के मौसम की विविधता चल रही है. उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ पूर्व व मध्य भाग के राज्यों में मध्य प्रदेश सहित मानसून के दूसरे दौर की जोरदार वर्षा हो रही है, सूखती जा रही फसलें अब डूबने से बर्बाद हो रही हैं.

लेकिन भारत के अन्य दस राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट, गुजरात, उड़ीसा, कर्नाटक, अल्प वर्षा से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. यहां समय पर पर्याप्त वर्षा न होने से फसलें सूख रही हैं. इन दस राज्यों में से कर्नाटक में स्थिति सबसे ज्यादा खराब चल रही है. केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने कहा है कि यदि अगले दो महीनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो देश को ‘गंभीरÓ हालत का सामना करना पड़ सकता है. किसानों में खरीफ फसल और चारे को लेकर चिंता बढ़ गई है. धान की बुआई अभी तक 18 लाख हेक्टेयर से नहीं हो पाई है. उम्मीद है कि अगस्त तक इस कमी को पूरा कर लिया जायेगा. श्री पवार भी अगले दो महीने तक उम्मीद रखते हैं कि अच्छी बारिश हो सकती है और स्थिति सुधर जायेगी.

यह अच्छा होता कि यदि श्री पवार यह बयान अभी न देकर दो महीने बाद देते. हमेशा यही पाया है कि श्री पवार का हर बयान एक भयावह स्थिति का अंदाजा जताता है और उससे फौरन ही मूल्य वृद्घि हो जाती है. उनके बयानों से गेहूं, चावल, शक्कर, कपास के दाम बम्पर फसलें आने के बाद भी बढ़ते गये हैं. अब उन्होंने अपना निशाना मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, मक्का व दालों को बनाया है. अब इनके भी दाम बढ़ाना चाहते हैं. यदि इस संभावना को देखते हुये कुछ कदम उठाना है तो श्री पवार को अगले दो महीनों तक किसी भी खाद्यान्न वस्तु का निर्यात ही नहीं करना चाहिये, लेकिन यह खबर भी आ गई कि भारत ईरान को गेहूं का निर्यात कर रहा है. अभी 15 लाख टन भेजा जा रहा है. बाद में यह बढ़ाया भी जा सकता है. बासमती के बारे में यह धारणा आम बोलचाल में आ गई है कि इसे पैदा भारत करता है, लेकिन इसे पेट्रोल उत्पादक अरब देश के लोग खाते हैं. भारत में यह आम आदमी    से दूर केवल धनी वर्ग तक सीमित रह गया है.

अभी वर्षा सितंबर के अंत और अक्टूबर के प्रारंभ तक होनी बाकी है और भरपूर वर्षा का एक महीना भादों भी बाकी है. सरकार का काम लोगों का हौंसला बनाये रखना होता है, लेकिन श्री शरद पवार का काम हौंसला तोडऩा ही होता है. संकट न होने पर भी वे संकट पैदाकर देते हैं. श्री राहुल गांधी भी मूल्य वृद्घि पर उन पर कटाक्ष करते हुये यह कह चुके हैं कि साझा सरकार की मजबूरी है. हम लोगों ने खुद ही अपनी दयनीय दशा बना ली है. बरसात न हो तो ‘हाय-हाय’ और हो जाये तो ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. दोनों ही स्थितियों में लोगों को ‘राहत’ चाहिये. सबके सामने आ रहा है कि पूरे देश में गेहूं भरा पड़ा है. रखने की जगह नहीं हो पाती और खुले में लाखों टन खराब हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इससे अच्छा तो यह रहेगा कि इसे मुफ्त में गरीबों में बांट दिया जाये. निर्यात भी करने लगते हैं. साथ ही ‘काल्पनिक आपदा’ और वास्तविक मूल्य वृद्घि से त्रस्त भी रहते हैं. एक नहीं दो सूखा पड़ जाये फिर भी देश में इतना अनाज भंडारण है कि कोई कमी नहीं रहेगी. भरपूर की
स्थिति है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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