नयी दिल्ली, 3 अक्टूबर, परोक्ष रूप से भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों की देश भर में काफी कमी हो गई है. मध्यप्रदेश सहित देश के कई राज्यों में डॉक्टरों का आभाव है. ग्रामीण ईलाकों में स्थिति और भी दयनीय हो चुकी हैं. ग्रामीण ईलाकों में स्थित कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संविदा आधारित डॉक्टर ही चला रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों पर ध्यान दें तो आश्चर्यजनक नतीजे सामने आते हैं. मध्यप्रदेश में ग्रामीण ईलाकों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 1155 डॉक्टरों की संस्तुति की गई है लेकिन पचास प्रतिशत से अधिक सीटें रिक्त हैं. सूबे के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 2010 तक 614 सीटें रिक्त हैं, यहीं नहीं मुख्य स्वास्थ्य केंद्रों में भी 502 डॉक्टरों की संस्तुति की गई है लेकिन 257 पद रिक्त हैं. ऐसे में महज यह कल्पना किया जा सकता है कि मुख्य स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंदों में ईलाज कराने वाले लोगों का ईलाज कैसे चल रहा होगा. हालांकि दूसरे राज्यों में डॉक्टरों का इतना टोटा नहीं है.

अन्य राज्यों में तीस प्रतिशत तक सीटें रिक्त है लेकिन सूबे में पचास प्रशित से अधिक सीटें रिक्त हैं. ऐसे में यह सहज सवाल उठता है कि शहर और ग्रामीण ईलाकों में सरकारी अस्पतालों पर आधारित लोगों का ईलाज कैसे चल रहा होगा. बिहार के मुख्य स्वास्थ्य केंद्रों में 280 डॉक्टरों की संस्तुति है लेकिन मात्र 104 डॉक्टर ही काम कर रहे हैं बाकी (176) पद रिक्त है, पश्चिम बंगाल के मुख्य स्वास्थ्य केंद्रों में 542  पद संस्तुति है लेकिन (367) रिक्त हैं. स्थिति का जायजा इस बात से लिया जा सकता है कि उत्तरप्रदेश के प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों पर ध्यान दें तो 4509 में से (1648) सीटें रिक्त हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि आम तौर पर डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद छात्र निजी अस्पताल में मोटी सैलरी पैकेज पर ज्वाईन कर लेते हैं. सरकारी अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टर भी ग्रामीण ईलाकों में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं. गौरतलब है कि ग्रामीण ईलाकों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक डॉक्टर की अनिवार्यता होती है.

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