मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि राज्य में गुन्डों को पकडऩे का अभियान चलाना जायेगा. इसमे’ अभियान जैसी क्या बात है. पुलिस का गठन ही इसलिए प्रारंभ से ही चला आ रहा है कि वह उन लोगों को पकड़कर सजा दे या अदालत से दिलाये जो लोग कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए गुंडागिरी करते है. पुलिस का यह अभियान तो उसकी सतत् कार्यवाही है. फिर भी जब गुंडागिरी होती ही रहती है या बढ़ जाती है तो वही पुलिस की नाकामी भी मानी जाती है.

मुख्यमंत्री के बयान में ऐसा  आभास है कि वह मान रहे है कि पुलिस उसके अनिवार्य काम में असफल रही है और अभियान की जरूरत है. बात कुछ हद तक सही भी है. पहले डकैतियां ग्रामीण अंचलों में भिंड मुरैना जिलों तक सीमित थी अब तो डकैतियां दिन दहाड़े बीच सड़कों पर बैंकों में, घरों में घुसकर शहरों व राजधानी भोपाल में भी पूरे जोरों पर चल रही है. डी.जी. से लेकर कान्सटेबिल पर हजारों की तादाद व कानूनी ताकत की पुलिस हर जगह मौजूद है. फिर भी अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं. सबसे पहले उत्तरप्रदेश में एक गुन्डा एक्ट बना था. उस समय लगा था कि अब गुन्डागिरी खत्म हो जायेगी. लेकिन पुलिस भी बनी रही, गुन्डा एक्ट भी बना रहा और गुन्डे भी बने रहे.

सवाल यह है कि जब कानून है, पुलिस है, शासन व्यवस्था है, अदालतें व जेल हैं फिर भी अपराध क्यों होते रहते हैं. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पुलिस वास्तव में ‘एफ.आई.आर.Ó पुलिस बनी रहती है. शिकायत आयेगी तो कार्यवाही करेंगे. अपनी तरफ से खुद होकर गुन्डों को दबाकर नहीं रख सकते. अदालतें कहती हैं कि गवाह होंगे तो ही सजा दी जा सकेगी. दिल्ली के पॉश इलाके में भीड़ भरे रेस्ट्रां में जैसिकालाल को गोली मार दी गई, लेकिन एक गवाह नहीं मिला था. गुन्डे तो उन पर भी गुन्डागिरी व कातिलाना हमले करेंगे जो उनके खिलाफ गवाह बनेंगे. भोपाल में तो सत्तारूढ़ भाजपा का एक स्थानीय नेता सिमी के आतंकी के विरुद्ध गवाही देने में हिचक गया और उसकी प्रशंसा कर डाली. उसे जमानत मिल गई. अपराधी आज जेल से छूटते हैं और फिर अपराध करने लगते हैं. सिलसिला टूट नहीं रहा है.

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