विश्वव्यापी आर्थिक व वित्तीय संकट में हर देश अपनी-अपनी व्यवस्थाएं बचाने व सुधारने में लगे हैं. यूरो जोन में आये ग्रीस और स्पेन के ऋण संकट पूरे विश्व की आर्थिक व्यवस्था व आयात-निर्यात व्यापार को ध्वस्त करता जा रहा है. इससे ग्रीस, स्पेन आयरलैंड, इटली की सरकारें अपनी अर्थ व्यवस्थाओं को सम्हाल नहीं पाये और स्थिति इतनी विकराल हो गई कि अब यूरोपीय संघ यूरो जोन के रूप में राजनैतिक एकता और उनकी एकीकृत मुद्रा ”यूरो” ही अस्तित्व के खतरे में आ गई.

इसके कारण दुनिया में अमेरिकी डालर की मांग इतनी बढ़ गई कि उसके विनिमय मूल्य भारत सहित सभी राष्टï्रों यूरोप का यूरो, भारत का रुपया, चीन का युआन व जापान का येन व रूस का रुबल तक लडख़ड़ा गये. डालर का विश्वव्यापी महत्व दुनिया में हमेशा से इसलिए बना हुआ है कि अरब क्षेत्र के पेट्रो क्रूड उत्पादक देश उनके तेल का व्यापार दुनिया उनकी खुद की या आयातक देशों की मुद्रा न करके अमेरिकी डालर में करते है. इसकी वजह से जब भी डालर में उलटफेर होता है तो उसका असर पेट्रो क्रूड के मूल्यों पर पड़ता है. अरब राष्टï्र इसकी वजह यह भी बताते हैं कि अमेरिका ही उनका सबसे बड़ा खरीददार है और उसकी मुद्रा डालर रूपी देशों में बढ़ती कीमत पर ग्राह्यï होती है.

लेकिन इन दिनों राजनैतिक कारणों से अमेरिका ने पहले इराक और अब ईरान पर पेट्रो क्रूड को लेकर ही आर्थिक नाकाबंदी कर दी है. इसका भारत के हित में एक बड़ा परिवर्तन यह आया कि ईरान ने भारत में पेट्रो क्रूड का मूल्य रुपया में लेना प्रारंभ कर दिया और भारत के डालर कोष पर दबाव काफी कम हो गया. केंद्रीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने शिथिल अर्थव्यवस्था को वित्तीय प्रोत्साहन की संभावना को नकारते हुए कहा है कि इसी वित्तीय वर्ष में भारत की विकास दर में वृद्धि आनी शुरू हो जायेगी. अंतरराष्टï्रीय बाजार में पेट्रो क्रूड के दामों में कमी आ रही है और मानसून भी अच्छा रहने की आशा है. लेकिन श्री मुखर्जी के ये दोनों अनुमान सट्टा बाजारी तर्ज के लगते हैं क्योंकि इन दोनों के आधार पर दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता. पेट्रो क्रूड के भाव कभी भी चढ़ सकते हैं और इससे भी ज्यादा उतर सकते हैं. मानसून का भरोसा ईश्वरीय वरदान ही होता है. कभी भी कुछ उलटफेर हो जाती है.

समयचक्र में थोड़े ही दिनों का परिवर्तन फसल चौपट कर जाता है. सन् 11-12 में ही सकल घरेलू विकास दर 8.4 प्रतिशत से 9 वर्षों में सर्वाधिक घटकर 6.5 प्रतिशत रह गई थी. कई अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का आंकलन यह है कि वर्ष 12-13 में यह और घटकर 5.7 प्रतिशत तक जा सकती है. एस.एंड वी. अन्तरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने चेताया है कि ब्रिक्स राष्ट्रों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में गिरावट की वजह से भारत की विनिमेश की रेटिंग गिर सकती है. भारत को इसके लिये अभी से तैयार रहना चाहिए कि आने वाले समय में वह अर्थव्यवस्था में पडऩे वाले संभावित झटके को सह सके.

इस संदर्भ में एक ऐसी चेतावनी आई है जिस पर भारत या अन्य कोई देश अपनी ओर से कुछ भी नहीं कर सकता. उसे उस विकट परिस्थिति से येन-केन-प्रकारेण स्वयं ही निपटना होगा. यदि यूरो जोन धराशायी होता है तो इससे भारत को बहुत करारा झटका लगेगा और इस समय इससे पार पाने की ताकत उसके पास या किसी अन्य राष्ट्र के पास नहीं है. दुनिया के साथ भारत भी मंदी की तरफ बढ़ रहा है. यूरो जोन का आर्थिक संकट एक विकट समस्या है. वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस समय ऐसी स्थितियां बन रही हैं कि उनके लिये किसी भी देश की सरकार की घरेलू नीति को दोष नहीं दिया जा सकता. भारत ने निर्यात व्यापार में 20 प्रतिशत की वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया है और इस पर फौरन कार्य भी प्रारंभ हो गया. इसके साथ ही भारत को उच्च आर्थिक वृद्धि दर की राह पर……. पास लाने के प्रयास किये जा रहे हैं. वित्त मंत्री ने यह हौसला जाहिर किया है कि 2012-13 अर्थ-व्यवस्था के लिये सुधार का
वर्ष होगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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