• hpy republic dayविशेष संपादकीय

प्रफुल्ल माहेश्वरी

भारतीय गणराज्य के गणतांत्रिक स्वरूप की 63 वर्षों की यात्रा के दरमियान हमारे राष्ट्र ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी हमें ऐसा लगा होगा कि गणतंत्र अपनी अग्नि परीक्षा में किस स्तर के साथ उत्तीर्ण होगा- ये आशंकाएं कभी सच साबित होती रही होंगी, तो कभी निर्मुल भी साबित हुई होंगी, लेकिन गणतंत्र व्यवस्था का सही आकलन किन्हीं एक दो घटनाक्रमों से नहीं किया जा सकता है। यह वह किताब है जिसका अध्ययन, विश्लेषण, समालोचन के आधार का मुख्य बिंदु-भारत का आम ‘गण’ ही होना चाहिए। उसकी आत्मा होना चाहिए। उसके मूलभूत अधिकार होना चाहिए। उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल होना चाहिए। समतावादी समाज की स्थापना में समाज के अंतिम व्यक्ति की प्राथमिकता होना चाहिए। इन सब लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तंत्र का चिंतन, आयोजन, क्रियान्वयन-भारत के आम नागरिक के हितों की ओर संपूर्ण समर्पित होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह माना जाना चाहिए कि गणतंत्र में कहीं न कहीं कोई ‘वास्तुदोष’ आ रहा है।

भारतीय गणतंत्र केवल अपने भीतर झांककर इसकी अच्छाई या विसंगतियों से प्रसन्न अथवा असंतुष्ट होने की प्रक्रिया भर नहीं है। हम दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र हैं। इसलिए इसे इस दृष्टि के साथ भी देखा जाना चाहिए कि यह संसार की बड़ी ‘प्रयोगशाला’ है और समय-समय पर इसकी ‘समीक्षा’ करते रहना चाहिए। साध्य गणतंत्र-जिसका सपना आजादी के दौरान देखा गया था, क्या साधनों की शुचिता के साथ गठबंधित हैै? क्योंकि यदि ऐसा नहीं है तो इस ‘भवन’ में विसंगतियों के कई ‘केक्टस’ दिखाई दे सकते है। इसकी गवाही हर पींिड़त आम आदमी के उस चेहरे से मिल सकती है, जिसकी आंखे नम है। उदास है। सपने अधूरे हैं। ऐसी कुछ टीस लिए हुए है जो यह बताती है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

हमारे संविधान, कानून, नियम, उपनियम का जमीनी पक्ष कई बार प्रबल नहीं रहता है। भारत के आम नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का या तो सरेआम हनन होता है या ‘तंत्र’ की उनकी ओर केवल उपेक्षा भरी दृष्टि रहती है। भीड़ तंत्र दो रूप में हावी हो रहा है। एक तो ‘गण’ कभी-कभी केवल भीड़ में बदल जाता है। ऐसा पिछले कुछ वक्त से ज्यादा हो रहा है। इसके पीछे भाव यही है, हम जो कह रहे हंै-उसे करो। और उसे अभी इसी वक्त ही करो! दबाव यह बनाया जाता है कि स्थापित संवैधानिक व्यवस्थाओं को हाशिएं पर करो और हमारी ही सुनो! यह ठीक नहीं है। वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन उस लक्ष्य से करती है, जिसमें उनके सामने जनता वह ‘भीड़’ होती हैै जो उनके लिए ‘वोट’ भर है। इसको लाभ पहुंचाने के लिए यदि संविधान की मूलभूत अवधारणा से भी आंखे मूंदनी पड़े तो वह मंजूर होता है! कानून चुटकियों में शिथिल कर दिए जाते है। नियमों को धर्म समझने वाला नागरिक अपने साथ उस समूह को खड़े पाता है जो अब तक उन नियमों का मखौल उड़ाया करता था। तब हम कैसे कह सकते हैं कि हम उस साएं के नीचे है, जहां कानून सर्वोपरी हैै। हमारे देश में गणतंत्र को नीचे से उपर तक मजबूत करने के बहुत प्रयास हुए।

इसमें ग्राम सभाएं, पंचायती राज का सुदृढ़ीकरण और नगर निकायों की मजबूती रही है, लेकिन यहां भी ‘बलशाली’-प्रभावी भूमिका में है और इनक ऊपर की चुनी हुई सरकारें इनका इस्तेमाल राजनीति अथवा अन्य मसलों के चलते ‘कठपुतली’ की भांती ही करती हैै। ऐसे में नीचे से ही असली ‘गणराज्य’ संकट में आ जाएगा, तो शिखर तक इसकी पवित्रता कैसे कायम रखी जा सकेगी-यह आज भारत क सामने एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है। आम नागरिकों की मूलभूत सुविधाएं और अधिकार खत्म हो रहे है। आर्थिक उदारीकरण की मंशा आम आदमी को लाभ पहुंचाना होना चाहिए। हमें यह देखना है कि कहीं अमल में गणतंत्र की मूल भावना को हाशिए पर तो नहीं रखा जा रहा है। यह भारत का वह दौर है, जहां माफियाओं की दबंगई अकेले भर समस्या नहीं है, वरन कार्पोरेट और राजनेताओं की दबंगई से समूहों में जनता की आंख आंसुओं से भरी है। यह भी चिंतन का मुद्दा है।

जब ऐसा होता है तो आम नागरिक के सड़क, पानी, आवास से जुड़े मूल अधिकार हाशिएं पर होते है। और प्राकृतिक संसाधन संकट में आते है। देश की जनता के जागने की बावजूद बड़े और कू्ररतम अपराध कम नहीं हो रहे हैं। यह किसी एक क्षेत्र में नहीं, बल्कि अनेक राज्यों में हो रहे है। आम नागरिक की सुरक्षा से जुड़े सवाल पर भी तंत्र गंभीर नहीं है। सिस्टम के पास जब आम आदमी पहुंचता है तो उसकी तभी सुनी जाती है जब तंत्र की कडिय़ां विशेष महानुभावों अथवा अपने स्वार्थ से मुक्त हो जाती है, इसलिए आम आदमी को संतोष कहां है?
गणतंत्र दिवस क इस पड़ाव पर सभी को यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि हम हमारे संविधान की आत्मा को नष्ट नहीं होने दे। इस देश को आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण हो। तंत्र उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में अपनी शक्ति प्राथमिकता के साथ लगाएं आम आदमी की सहभागिता गणतंत्र की बुनियाद है। इसे और विस्तार देता है। हमें दुनिया को यह बताना है कि हम विशाल गणराज्य है, हमारा गणतंत्र विसंगतियों से परे है और इसमें भारत के अंतिम व्यक्ति की खुशियां वास करती है। विश्वास है भारत का गणतंत्र और मजबूत होगा। इस राष्ट्रीय पर्व की सभी को शुभकामनाएं….

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