इस देश का यारों क्या कहना- जिस देश का शिक्षा मंत्री ही यह कहे कि देश की शिक्षक बिरादरी उतनी शिक्षित नहीं है जितनी की इसे होना चाहिये. सेंट्रल एडवायजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन की 59वीं बैठक में श्री कपिल सिब्बल इस स्थिति पर अफसोस जताते हुये यह कहा कि उन्हें बच्चों की शिक्षा के बदले शिक्षकों की शिक्षा की बात करनी पड़ रही है. श्री सिब्बल के बयान से शिक्षक वर्ग में असंतोष और विरोध होना स्वाभाविक है लेकिन यह भी यथार्थ है कि यही

यथार्थ है. शिक्षा की दुर्दशा की बात यहीं तक नहीं है. प्राथमिक और सिविल स्कूलों में शिक्षक जाते नहीं हैं- जाते हैं तो पढ़ाते नहीं हैं. हाई स्कूल, हायर सेकेंडरी तक कॉलेजों की शिक्षा की परीक्षा पूरी तौर पर ‘सामूहिक नकलÓ बन चुकी है. स्थिति इतनी विकराल हो चुकी है कि पहले केवल परीक्षा हाल के इन्विजीलेटर ही नकल न होने देने का काम करते हैं, लेकिन पूरा जिला प्रशासन सभी विभागों से अधिकारी इकट्ïठा कर छापेमारी के रूप में ‘सामूहिक नकलÓ को रोकता है और वह इतनी व्यापक हो चुकी है कि उसे पूरी तौर पर छापेमारी से पकड़ा भी नहीं जा सकता और वह चलती चली जा रही है. इस कारण योग्य और अयोग्य छात्र की परख ही नहीं हो सकती. मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं अन्य उच्च प्रोफेशनल विषयों में भर्ती के लिये चयन परीक्षाओं में ही नकल का व्यवसाय करने वाले संगठनों द्वारा ‘मुन्ना भाईÓ पहुंचने लगे हैं. फर्जी छात्र फर्जी डिग्री पाकर बड़ी-बड़ी नौकरियों में भी पहुंच गये हैं. यही वर्ग शिक्षक भी बना होगा. शिक्षा की दुर्दशा शिक्षा के सभी क्षेत्रों में व्याप्त हो चुकी है.

इन बुराइयों पर निराशा या हताशा नहीं दिखाई गई और इन पर कार्यवाहियां भी बढ़ती जा रही हैं. इसी संदर्भ में श्री कपिल सिब्बल ने बड़ी उत्साहवद्र्घक घोषणा भी की है कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता बढ़ाने के लिये इस वर्ष 6 हजार करोड़ रुपयों की लागत में राष्टï्रीय अध्यापक एवं प्रशिक्षण मिशन लागू कर रहे हैं. अध्यापन के लिये देश के सर्वश्रेष्ठï एवं प्रतिभाशाली लोगों की शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्त करेगी. इस घोषणा के क्रियान्वयन पर भी आशा है, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में सी.ए. बी.ई. निर्णय लेने का शीर्ष
निकाय है.

ग्रामीण अस्पतालों जहां डॉक्टरों का टोटा बना हुआ है, वहीं ग्रामीण स्कूलों में स्थिति इससे ज्यादा बदतर है. शिक्षक केवल वेतन लेते हैं, स्कूलों में जाते नहीं हैं. बहुत से लोगु अपनी जगह अपने बेपढ़े नौकरों को वहां केवल बैठने के लिये भेज देते हैं. ग्रामीण स्कूलों में बच्चे तो जाते हैं, पर शिक्षक ही ‘ड्राप आऊटÓ हो जाते हैं. अनिवार्य शिक्षा पर केंद्र व राज्यों में वैसी ही स्थिति फिर निर्मित हुई है, जैसी मुख्य चुनाव आयुक्त श्री शेषन ने फोटो युक्त चुनाव पहचान पत्रों को बनवाना अनिवार्य कर दिया था. सभी राज्यों ने कहा था कि इस पर जो खर्च आयेगा उतना फंड उनके पास नहीं है.

यही बात शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत अनिवार्य शिक्षा पर आ रही है. बोर्ड की बैठक में मध्य प्रदेश की शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनीस ने कहा कि 2013 तक नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा पूरे देश में लागू करना संसाधनों के अभाव में संभव नहीं है. अन्य राज्यों के शिक्षा मंत्रियों ने भी यही कहा कि इसके लिये केंद्र राज्यों को आर्थिक संसाधन उपलब्ध करायें. केंद्र सरकार व श्री सिब्बल को गौर करना चाहिये केवल शिक्षा का अधिकार का कानून भर बना देने से कुछ नहीं होगा- क्रियान्वयन बिना सब लफ्फाजी हो जाता है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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