भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एस.वाई. कुरेशी ने चुनाव आयुक्तों को संरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत बताई है. भारत के संविधान में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. लेकिन न जाने कैसे वह श्री टी.एन. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले तक स्वत: ही केंद्र के विधि मंत्रालय के एक विभाग के रूप में काम करने लगा. उस समय तक सरकार ही यह तय करती थी कि कब कहां चुनाव आयोग चुनाव करा सकता है. उप चुनावों तक के  बारे में भी यही स्थिति होती थी. श्री शेषन ने बिना किसी शासकीय आदेश या संविधान संशोधन की मांग किये स्वत: ही चुनाव आयोग को संविधानिक संस्था की स्थिति व गरिमा में ला दिया. उन्होंने कुछ भी नया नहीं किया था. सिवाय इसके कि आयोग को संविधान जैसा होना और करना चाहिए. वह अपने अकेले दमखम से कर दिया. श्री शेषन को श्री राजीव गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर को कहकर मुख्य चुनाव आयुक्त बनवाया था. उस समय चंद्रशेखर सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी.

श्रीमती रमा देवी मुख्य चुनाव आयुक्त थी, उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाकर श्री शेषन को चुनाव आयोग का पद दिया गया था. श्री शेषन अपने आई.ए.एस. के सर्विस केरियर में ‘दबंग’ अधिकारी माने जाते रहे. वे तमिलनाडु के केडर के थे और आई.ए.एस. की चयन परीक्षा में ‘टॉप’ किया था. श्री शेषन की दबंगाई में प्रधानमंत्री श्री नरसिंहाराव और सभी राजनैतिक दल इतने भड़भड़ा गये कि उन्हें राज्यपाल या राजदूत बनाकर हटाने की कोशिश की गई. उन पर महाभियोग चलाने की भी कोशिश की गई. लेकिन संवैधानिक पद होने के कारण वे टस से मस नहीं हुए. उसी का परिणाम यह है कि आज चुनाव आयोग वास्तव में संवैधानिक संस्था के रूप में काम कर रहा है. इसी वजह से अब भारत के चुनावों को संसार में सर्वश्रेष्ठï माना जाता है. इसी काल में श्री शेषन को कुछ नियंत्रित करने के लिये पहली बार चुनाव आयोग ने दो और चुनाव आयुक्त श्री एस.एस. गिल व श्री कृष्णमूर्ति बनाये लेकिन श्री शेषन के नेतृत्व में कमी नहीं आई और उन दोनों ने श्री शेषन के लिये कोई अड़चन पैदा नहीं की. एक अन्य मुख्य चुनाव आयुक्त श्री लिंगदोह भी श्री शेषन की राह पर ही चले और बड़ी सफाई से चुनाव कराये.

आयोग में केवल एक श्री नवीन चावला को चुनाव आयुक्त बनाने पर राजनैतिक दलों में विरोध के स्वर उठे थे और मुख्य चुनाव आयुक्त श्री गोपाल स्वामी ने भी उनके विरुद्ध मत व्यक्त किया  था. लेकिन सरकार ने उन्हें हटाया नहीं और वे मुख्य चुनाव आयुक्त भी बने. इस समय स्थिति यह है कि तीन सदस्यीय आयोग में यदि दो आयुक्त किसी निर्णय पर एक हो जाएं तो वे मुख्य चुनाव आयुक्त को निष्प्रभावी कर सकते है. श्री कुरेशी इसी स्थिति पर संविधान संशोधन चाहते हैं कि आयुक्त की मुख्य आयुक्त के पद पर वरीयता के आधार पर स्वत: पदोन्नति हो जाए यह सरकार के निर्णय पर न रहे. लेकिन यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि हर निर्णय में मुख्य चुनाव आयुक्त की सहमति जरूरी हो केवल दोनों आयुक्त बहुमत से ‘वीटो’ न बन जाए. बहुमत राजनैतिक व प्रजातंत्रीय विचार है. इसे सिविल सर्विस के क्षेत्र में लागू करना उचित नहीं होगा. शासन में पद के अनुसार अधिकारी के पास अधिकार होते हैं. और उसी से शासन प्रशासन का सुचारू संचालन होता है. वहां बहुमत या अल्पमत की व्यवस्था लागू करने से सब चौपट ही हो जायेगा. कोई काम नहीं हो सकेगा और सर्विस में अनुशासन नहीं रह जायेगा तथा  Insubordination हो जायेगा. पूर्व स्थिति के संदर्भ में श्री कुरेशी ने जो संविधान संशोधन सुझाया है वह सर्विस के तौर तरीकों के अनुरूप है. अब चुनावों में यह आरोप तो लगते है कि राजनैतिक दल या उम्मीदवार गलत काम करते है. लेकिन चुनाव आयोग का चुनाव संचालन अब संदेह से परे है जो प्रजातंत्र के लिये बहुत जरूरी और अनिवार्य है. इन दिनों रूस में चुनावों की निष्पक्षता भंग हो गई है और वहां आंदोलन हो रहे हैं.

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