इस समय देश में माहौल के अनुरूप राजनीति का स्वरूप चुनावी हो गया है. पांच राज्यों में विधानसभाओं के आम चुनाव 28 जनवरी को मणिपुर से प्रारंभ होकर 30 जनवरी को पंजाब व उत्तराखंड में, फरवरी में सर्वाधिक 7 चरणों में उत्तर प्रदेश में 4-8-11-15-19-23-28 को और आखिरी चुनाव 3 मार्च को गोवा में होगा और उसके बाद ही मतों की गणना होगी. इसमें उत्तर प्रदेश के चुनावों पर सबसे ज्यादा और फिर पंजाब पर राजनीति गर्मा रही है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों के लिए घमासान होगा. वहां एक अर्से तक साझा सरकारों के दौर के बाद मायावती ने बहुजन समाज पार्टी के स्वयं के बहुमत की सरकार बनाकर गत 2007 के चुनावों में निश्चित ही बड़ी उपलब्धि अकेले दम पर हासिल की थी. उस समय उनके मान्यवर श्री कांसीराम का निधन हो चुका था. बहुजन समाज पार्टी ने तीन अंकों में 206 सीटें जीती थीं. जबकि बाकी सब दो अंकों तक रहे- समाजवादी पार्टी 97, भारतीय जनता पार्टी 51, राष्ट्रीय लोकदल (अजीत सिंह) 10, कांग्रेस मात्र 2 और स्वतंत्र 16. इस राज्य में सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटें हैं. मायावती को सरकार बचाना और पुन: सत्ता में लाना है. इस सरकार को उखाडऩे के लिये अलग-अलग रहकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी पूरा कसबल…. लगा रही हैं.  कांग्रेस का मोर्चा पार्टी के सांसद व महामंत्री श्री राहुल गांधी स्वयं सम्हाले हुए हैं. वे स्वयं व उनके प्रति अन्य लोग भी इससे आशान्वित हैं कि उन्होंने गत विधानसभा में मात्र दो सीटें जीतने वाली पार्टी को लोकसभा के दो वर्ष बाद 2009 के चुनावों में 21 सीटें जिता दी. जबकि सत्तारूढ़ बसपा को 20, सपा को 23 और भाजपा को 10 सीटें मिलीं. इस विधानसभा में अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोकदल जिसके पास इस समय 10 विधायक हैं, वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहा है. ऐसा अनुमान है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश की 70 सीटों पर कांग्रेस-लोकदल गठबंधन भारी है.

इससे पहले भी श्री अजीत सिंह अपने दल को कांग्रेस में सम्मिलित कर चुके हैं. लेकिन बाद में संबंध तोड़ लिये थे. इसका विलय समारोह भोपाल में हुआ था और तत्कालीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह ने उन्हें पार्टी की तरफ से स्वीकार किया था. चुनावी तैयारी में मायावती ने एक काम ऐसा किया है जिससे यह अंदाजा किसी को भी नहीं हो रहा कि उससे उन्हें फायदा होगा या नुकसान. हाल ही कुछ महीनों में उन्होंने अपने 15 मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिमंडल से निकाल दिया. कुछ को हटाने की अनुशंसा राज्य के लोकायुक्त ने की थी- कुछ को उन्होंने स्वयं हटाया. उनमें से एक बाबूसिंह कुशवाहा को भारतीय जनता पार्टी ने लपक लिया. लेकिन इसके विरुद्ध जो तीव्र प्रतिक्रिया हुई उससे भाजपा के नेतृत्व के लिये ‘सर मुंडाते ही ओले पड़ गये’ लेने के देने पड़ गये. बचाव में श्री यशवन्त सिन्हा ने कहा कि कुशवाहा ”व्हिशिल ब्लोअर” है जो मायावती का भ्रष्टïाचार उजागर करेगा. लेकिन हकीकत यह है कि कुशवाहा स्वयं सीबीआई के जांचों व छापों के घेरे में है. वह मायावती के विरुद्ध तो व्हिशिल बजा नहीं पाया. लेकिन उसने भा.ज.पा. की व्हिशिल जरूर बजा दी. अब खुद ही भा.ज.पा. से दूर हट गया है और भा.ज.पा. भी राहत महसूस कर रही है कि ”जान बची लाखों पाये”. इधर श्री राहुल गांधी ने यह रहस्य खोल दिया कि कुशवाहा भा.ज.पा. में जाने से पहले कांग्रेस में शामिल होने आया था लेकिन उसे भगा दिया था. भा.ज.पा. को डर बैठ गया कि इसकी इस कांड की वजह से कहीं मतदाता उसकी व्हिशिल न बजा दें.

समाजवादी पार्टी में भी मेरठ क्षेत्र के माफिया डी.पी. यादव को लिया जाए या न लिया जाए पर अंदरुनी कलह मैदान में आ गई है. राज्य पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव ने उन्हें लेने से इंकार कर दिया. इसके विरुद्ध पार्टी के बड़े नेता श्री मोहन सिंह व श्री आजम खान नाराज है. श्री डी.पी. यादव ने परिवर्तन पार्टी बना ली और समाजवादी पार्टी का मटियामेट करने की राह पकड़ ली. मायावती ने चुनावी दूरदृष्टिï में काफी पहले ही राज्य में उनकी स्वयं की व पार्टी के चुनाव चिन्ह ”हाथी” की पत्थर की बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगवा दी. चुनाव के संदर्भ में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एस.वाई. कुरैशी ने लखनऊ में आदेश दे दिया कि मायावती मूर्तियों को ”परदे में रहने दो, पर्दा चुनाव बाद उठ जाएगा”. इसी चक्कर में उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह ”हाथी” भी परदे में हो जायेगा. वैसे इस समय चुनावी टक्कर बहुजन समाज पार्टी व कांग्रेस में ही नजर आ रही है.

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