मुंबई, 11 जून. देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने एक और विवादास्पद बयान देकर सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।

बसु ने चेतावनी दी है कि अगर यूरोजोन धराशायी होता है तो भारत को इससे करारा झटका लगेगा। उन्होंने स्वीकार किया इस संकट से पार पाने के लिए जरूरत ताकत भारत के पास नहीं है। इससे पहले आर्थिक सुधारों में देरी को लेकर अपने बयान से बसु सरकार को कटघरे में खड़ा कर चुके हैं। बसु ने कहा अगर यूरोप संकट में फंसता है तो वह बहुत मुश्किल वक्त होगा। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। हालांकि, हमारी (सरकार और रिजर्व बैंक) एक टीम बहुत सी संभावनाओं पर काम कर रही है कि कैसे उनमें अलग-अलग तरीके से रिएक्ट करना चाहिए।

लेकिन, अगर मैं यह कहूं कि हम इस संकट से निपट सकते हैं, तो यह झूठ होगा। हमें इसकी बहुत जबर्दस्त चोट पड़ेगी। यूरोजोन से ग्रीस के बाहर निकलने पर घरेलू इंडस्ट्री पर पडऩे वाले असर के बारे में उन्होंने कहा हम अभी संकट से बाहर नहीं निकले हैं। साथ ही इस बात का भी जोखिम है कि यह हाल फिलहाल में खत्म नहीं होने जा रहा है। हम पर इसका असर पड़ेगा।

एसएंडपी ने भारत को चेताया

धीमी होती विकास दर और राजनीतिक संकटों से जूझते भारत की इन्वेस्टमेंट रेटिंग में गिरावट की आशंका जताई गई है। मशहूर रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने चेतावनी दी है कि ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों में भारत ऐसा पहला देश हो सकता है जिसकी रेटिंग में गिरावट आ सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत मंदी की ओर बढ़ रहा है।   रेटिंग घटने से विदेशी संस्थागत निवेशकों और अन्य निवेशकों की तरफ से भारत में किए जाने वाले निवेश पर सीधा असर पड़ेगा। एसएंडपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास दर के सुस्त पड़ जाने और अर्थव्यवस्था के झटके सहने की क्षमता इस बात को तय करेगी कि भारत की रेटिंग बरकरार रहती है या इसमें गिरावट आती है।

एसएंडपी के क्रेडिट एनालिस्ट जॉयदीप मुखर्जी ने कहा उदारवादी और बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहे भारत और उसकी कर्ज लेने की क्षमता के लिए झटका है। एसएंडपी ने गिरती जीडीपी और अन्य कारकों के मद्देनजर अप्रैल, 2012 में भारत की रेटिंग स्थिर (स्टेबल) से नकारात्मक कर दिया था। गौरतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था पर छाए संकट के चलते लाखों नौकरियों पर तलवार लटक रही है।

विदेशी निवेशकों ने देश से निकाले एक लाख अरब

नई दिल्ली. धनी विदेशी इकाइयों ने तीन माह में ही भारतीय बाजार से करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक (करीब 20 अरब डॉलर) निकाल लिए हैं।

ये इकाइयां भारत में पी-नोट्स (पार्टिसिपेटरी नोट्स) के जरिए निवेश करती हैं। सरकार के कराधान दायरे और काले धन जाल में फंसने की आशंका से ये कंपनियां अपना पैसा निकाल रही हैं। विदेशी इकाइयों के इस कदम से कुल विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) में पी-नोट्स के जरिए किए गए निवेश की राशि का हिस्सा घटकर 10 फीसदी रह गया है। कुछ साल पहले यह 50 फीसदी से अधिक था। पी-नोट्स के जरिए अधिक आय वाले विदेशी तथा अन्य धनी निवेश भारत में निवेश कर सकते हैं।

यह निवेश एफआईआई के माध्यम से किया जाता है। सूत्रों का कहना है कि मार्च में जीएएआर की नई कराधान प्रणाली और कर कानूनों में पूर्व की तारीख से बदलाव के प्रस्ताव के बाद पी-नोट्स के जरिए निवेश निकलना शुरू हो गया। पी-नोट्स निवेशकों ने भारतीय इक्विटी और ऋण बाजार से पहले ही एक लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं, जबकि नई कर नीति के प्रस्ताव के बाद हुए 50,000 करोड़ के ताजा निवेश पर भी फैसला हो सकता है। हालांकि जीएएआर को एक साल के लिए स्थगित किया गया है। विदेशी लेन-देन के लिए प्रस्तावित टैक्स एफआईआई पर भी लागू होगा।

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