इस समय देश की आर्थिक स्थिति में सबसे बड़ा संकट यह है कि पेट्रो क्रूड की कीमतों में लगातार वृद्धि से विदेशी मुद्रा भंडार में डालर मुद्रा की लगातार कमी होती जा रही है. इसके साथ ही एक और बड़ा संकट यह आ पड़ा है कि डालर के मुकाबले रुपये का अवमूल्यन लगातार गिरता हुआ 56 के आसपास घूम रहा है. जबकि एक डालर के मुकाबले 45 रुपये या इसके आसपास भाव संतुलित माना जाता है.

ऐसी स्थिति में आयात घाटे का धंधा और निर्यात मुनाफे का धंधा हो जाता है. इस स्थिति में भी संतुलित विनिमय दर ही आर्थिक दृष्टिï से आदर्श मानी जाती है. लेकिन इस समय विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम हो जाने से यह जरूरी हो गया है कि निर्यात को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया जाए. इसमें भी इस बात पर जोर दिया जाता है कि जिस विदेशी मुद्रा की सबसे ज्यादा जरूरत हो उसी देश के मुद्रा प्रभाव क्षेत्र में निर्यात किया जाए. इस समय यूरोपीय संघ में ग्रीस-स्पेन ऋण संकट के कारण उनकी संयुक्त मुद्रा ”यूरो” भी डालर के मुकाबले कमजोर पड़ गई है. आज हालत यह हो गयी है कि अमेरिकी डालर अपने आप में विश्व मुद्रा बन गया है. इसलिए केंद्र सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने एक 7 सूत्री निर्यात कार्यक्रम बनाया है जिसमें इस वित्तीय वर्ष में डालर क्षेत्र में निर्यात को 20 प्रतिशथ बढ़ाकर 360 बिलीयन डालर की आय अर्जित करनी है. इसके लिए ब्याज पर 2 प्रतिशत की सबसिडी को एक साल के लिए और बढ़ा दिया गया है. निर्यात को भी तीव्र गति देने के लिए विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र (सेज) और निर्यातमुखी इकाई (ई.ओ.यू.) के लिए नई मार्ग दर्शिका तैयार की गई है.
निर्यात के मामले में सभी राष्ट्रों के सामने यह संकट आया हुआ है कि आर्थिक मंदी के कारण दुनिया भर में वस्तुओं की मांग में कमी आती जा रही है. इसका एक बड़ा कारण मुद्रा स्फीती के कारण उपभोक्ता मूल्यों का बढऩा है जिससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कम हो जाने से उपयोग की आम वस्तुओं में भी उपभोक्ता वर्ग कटौती करके अपने व्यक्तिगत पारिवारिक बजट को संतुलित करने का जी-तोड़ प्रयास करते हैं. निर्यातकों को आयात शुल्क में मिलाने वाली रियायतों का इस्तेमाल पहली बार उत्पाद शुल्क के एवज में छूट इस उद्देश्य से दी जा रही है कि वे देश के अंदरुनी बाजारों में ही खरीद कर सके. इससे देश के आंतरिक व्यापार में भी तेजी आ जायेगी और निर्यात की वस्तुओं का निर्माण होने से उद्योगों के मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर में आई भारी शिथिलता भी दूर हो जायेगी.

नई निर्यात वद्र्धक नीति की सफलता के लिये यह जरूरी है कि उन उद्योगों व उत्पादों पर विशेष जोर दिया जाए जो इस मंदी के दौर में भी विदेशों में अपनी मांग बनाये हुए है. इसमें प्रमुख है- खिलौने, खेल की सामग्री, प्रसंस्कृरित खाद्य उत्पाद और रेडीमेड गारमेंट. इन उद्योगों में श्रमिक व कुशलकारीगरों को काफी रोजगार मिलता है, जो बहुत बड़े वर्ग में आय वृद्धि करता है. इस समय देश का पेट्रो क्रूड के आयात में भाव वृद्धि को निर्यात बढ़ाकर संतुलित करने का लक्ष्य है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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