एक महीने बाद जून से जुलाई तक इंतजार कराके मानसून राज्य में अनुकूल होता जा रहा है. अभी इतनी बारिश तो नहीं हुई कि उसे सावन की झड़ी या झमाझम कह सके. लेकिन उससे इतना जरूर हो गया कि खेतों में खरीफ फसल की बुवाई का काम प्रारंभ हो गया. तापमान में गिरावट भी आई और आद्र्रता की परेशानी भी काफी कम हो गई. अभी वर्षा की पैमाइश मिलीमीटर में चल रही है. उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही इसकी गणना सेन्टीमीटर में भी होने लगेगी.

वर्षा की देरी की वजह से कुछ नुकसान यह तो हो ही गया कि खेती का रकबा थोड़ा घट गया है. अभी 6 जुलार्ई को देश भर में औसतन 7.5 मिलीमीटर बरसात हुई जबकि सामान्यतया 9 मिलीमीटर होनी चाहिए थी. मानसून का विस्तार लगभग देश के सभी भागों तक पहुंच गया है. उत्तर व पश्चिम में यह राजस्थान व पंजाब तक पहुंच गया है. दिल्ली में एक दिन भारी वर्षा हुई. मानसून पूरे उत्तर-पश्चिम व मध्य भाग में सक्रिय हो गया है. इससे खरीफ फसलों खासकर धान की रोपाई में तेजी आयेगी. राजस्थान में अभी तक बुवाई नहीं हो पाई थी, अब उसमें तेजी लायी जा रही है. लेकिन कहीं-कहीं बड़े क्षेत्र में वर्षा बढ़ती हुई दर्ज की जा रही है. उत्तर-पश्चिम में जहां 6 मिलीमीटर वर्षा होती थी वहां 8 मिलीमीटर हुई. मध्य क्षेत्र में 10 के स्थान पर 12 और पांच जुलाई को हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पंजाब के ज्यादातर जिलों में भी 12 मिलीमीटर तक वर्षा हुई. मध्यप्रदेश व गुजरात में वर्षा 1 से 16 मिलीमीटर तक हो गई.

अभी धान के रोपाई में काफी कसर बाकी है पिछले साल के 75.12 लाख हेक्टेयर के मुकाबले अभी तक 55.40 लाख हेक्टेयर में ही रोपाई हो पाई है. तिलहन में गत 37.35 के मुकाबले घटकर 26.55 लाख हेक्टेयर हुई है. कर्नाटक व पंजाब मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं. कर्नाटक में 5.4 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.25 लाख हेक्टेयर और पंजाब में 1.28 लाख से घटकर 90,000 हेक्टेयर रह गया है. कुल मिलाकर देश में गत वर्ष के 20 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 15 लाख हेक्टेयर में बोया जा सका है. मोटे अनाज भी 53 लाख हेक्टेयर से घटकर अभी 22 लाख हेक्टेयर तक पहुंचे है.

इन तमाम कमियों के बावजूद जुलाई में देश सभी फसलों की बुवाई में सामान्य स्थिति तक पहुंच जायेगा. केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री शरद पवार व मौसम विभाग ने भी यही कहा कि ऐसा आशंका निराधार  है एक महीने की देरी से नुकसान बहुत हो गया है. स्थिति सामान्य के करीब ही है और बुवाई में तेजी भी स्वत: आ गई है. देश में सूखे की जैसी स्थिति नहीं है.
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सोयाबीन की बुवाई सर्वाधिक पिछड़ गई है लेकिन इसकी बुवाई का समय 15 जुलाई तक होता है. अभी एक हफ्ते का समय बाकी है और किसान इस फुर्ती से बुवाई कर रहे हैं कि कोई कमी या कसर नहीं रह जायेगी. सब कुछ बराबर हो जायेगा.
लेकिन इस प्रारंभ हुई बरसात में एक बात यह जरूर हुई कि जहां भी गिरा वहां खेत बुवाई लायक हो गए और इतने कम पानी मे भी सब शहर व कस्बों में बाढ़ आ गई. घरों में पानी भर गया. बरसात अभी शबाब पर आई नहीं है लेकिन शहरों में बाढ़ आ गयी. पहले नदी-नालों में ही बाढ़ आती थी अब हर शहर में बाढ़ आती है. समुद्र किनारे बसा मुंबई महानगर भी बाढ़ में डूबा है. हर शहर में मकान तो खूब बने पर पानी की निकासी रुक गई है. लगता है रेन हार्वेस्टिंग जमीन पर सड़कों, गली, मोहल्लों में हो रही है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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