चुनाव आयोग गोवा विधानसभा चुनावों के निरीक्षण व नियंत्रण रखने के लिये केवल महिला अधिकारियों को नियुक्त कर रहा है. चुनावों में दूसरे राज्यों से आई.ए.एस. व आई.पी.एस. अधिकारी इन कामों के लिए नियुक्त किये जाने हैं जिन्हें ‘ऑब्जरवर’ कहा जाता है. गोवा समुद्री किनारे का एक सुन्दर व आकर्षक पर्यटन स्थल है. पूर्व में चुनाव आयोग को यह शिकायतें मिली थीं कि वहां जिन पुरुष अधिकारियों को आब्जरवर बना के भेजा गया था उनका आचरण चुनाव कार्य से विमुख होकर शराब पीना, क्लबों में बैठे रहना रहा. इनका खर्च चुनाव में खड़े उम्मीदवार उठाते रहे. कुछ उम्मीदवारों ने उनके इस आचरण की शिकायतें भी आयोग से की थीं. चुनाव आयोग ने यह पाया कि ये अधिकारी गोवा ड्यूटी को उनकी पर्यटन छुट्टी के रूप में सरकारी खर्चे पर मनाते रहे. इस बार के चुनाव के लिये भी कई राज्यों के अधिकारी इस बात के लिये भरसक प्रयास व लाबिंग कर रहे हैं कि उन्हें गोवा चुनावों के लिये आब्जरवर बनाया जाए.

लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने आब्जरवर ड्यूटी के लिए 12 राज्यों- मध्यप्रदेश, गुजरात, आंध्रप्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र से 20 महिलाओं को चुना है. इस बार केवल महिलाओं की निगरानी में ही गोवा के चुनाव सम्पन्न होंगे. चुनाव आयोग ने पाया है कि महिला अधिकारी अपने कार्य व दायित्वों के बारे में ज्यादा सजग, सक्रिय व निष्ठावान रहती हैं, जबकि पुरुष अधिकारी कार्य से विमुख होकर मौज-मस्ती व सैर-सपाटा की अय्याशी में लिप्त हो जाते हैं. चुनाव आयोग का इस नतीजे पर पहुंचना ही सारे भारत के पुरुष अधिकारियों को सेन्सर (निंदा) कर देता है. चुनाव आयोग ने केवल अपने अधिकार क्षेत्र में चुनाव के काम से पुरुष अधिकारी का तिरस्कार (Reject) किया है. लेकिन केन्द्र व राज्य सरकारों को ऐसे अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए जो देश के खजाने पर वेतन का बोझ बने हुए हैं और शासकीय धन का इस तरह दुरुपयोग करते हों, यह भी अपने आप में भारी भ्रष्टाचार है. इस पर और इन पर उसी नजरिये से कार्यवाही होनी चाहिए. साथ ही आई.ए.एस. की ट्रेनिंग का भी पुनरीक्षण किया जाए कि किस वजह से ये पुरुष अधिकारी वहां से कर्तव्यहीन, निष्ठाहीन अधिकारी के रूप में निकल रहे हैं. इस ढर्रे को बदलने के लिए शासकीय सेवाओं का महिलाकरण कर देना चाहिए. हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर ही दी है. इस आधी आबादी को पचास प्रतिशत की भागीदारी सुनिश्चित कर देना चाहिए.

दृष्टिकोण में अन्य क्षेत्र में भी परिवर्तन आया है. अभी कुछ समय पहले तक यह चलन में था कि महिला उत्पीडऩ के मामले महिला जजों की अदालतों में इसलिए नहीं दिये जाते थे कि उन्हें संकोच होगा. लेकिन यह नहीं सोचा गया कि पुरुष जज की अदालत में उत्पीडि़त महिला को कितना संकोच होगा. अब यह व्यवस्था शासन ने परिवर्तित करके निर्णय कर दिया कि महिला उत्पीडऩ के मामले केवल महिला जज की अदालत में ही सुने जायेंगे. समाज के दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन आ रहे हैं, लेकिन उसमें गति और ज्यादा आनी चाहिए. अब लोकपाल विधेयक के साथ ही महिला आरक्षण विधेयक भी पारित हो जाना चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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