भारत कृषि प्रधान देश है हम रासायनिक खाद का अधिकांश भाग विदेशों से आयात करते हैं और हमारे राज्य केन्द्र से रासायनिक खाद की फरमाइश करते हैं. जाहिर है कि आयात किये जा रहे खाद का मूल्य भी बढ़ता ही रहता है और उसका प्रभाव देश पर पडऩा स्वाभाविक है. इसी साल मई तक डीएपी खाद की कीमत 635 रुपये थी जो अब 4 महीनों बाद अक्टूबर में बढ़कर 965 हो गई. यह 330 रुपयों की एकाएक वृद्धि बहुत ज्यादा है. देश में न सिर्फ पेट्रोल व डीजल के दाम उछल रहे हैं बल्कि खेती के ‘इनपुट’ भी तेजी से ऊपरजा  रहे हैं.

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने केन्द्रीय रसायन मंत्री श्रीकांत जैना से कहा है कि केन्द्र इस बढ़ी कीमत को वापस ले या राज्य को उस पर सब्सिडी दे. मध्यप्रदेश खाद्यान्न उत्पादन में तेजी से आगे आया है. यहां लगभग सभी फसलें बम्पर हो रही हैं, लेकिन केन्द्र की तरफ से रासायनिक खाद की आपूर्ति पूरी जरूरत से काफी कम हो रही है. राज्य को पहली तिमाही में उतना खाद नहीं मिला जितना केन्द्र ने उसे आवंटित किया था. इससे राज्य में खाद का अभाव हो गया है. अक्टूबर के लिये जो खाद दिया जा रहा है वह भी जरूरत से काफी कम है.

राज्य में रबी फसलों का रकबा लगभग सात लाख हेक्टेयर बढ़ चुका है. बाकी उत्तरी राज्यों के मुकाबले यहां बुआई का काम 4 महीने आगे चल रहा है इसलिए मध्यप्रदेश में खाद की तात्कालिक आवश्यकता है. इस मामले पर राज्य सरकार को भी यह निर्णय लेना चाहिए कि सिर्फ इस नीति की घोषणा से कुछ नहीं होगा कि राज्य को कृषि राज्य बनाना है और कृषि को लाभ का धंधा बनाना है. इसके लिए यहां खेती की संरचना भी तैयार करनी है. मुख्यमंत्री राज्य के औद्योगिकीकरण पर भी बहुत प्रयास कर रहे हैं.

राज्य में 2013 तक खेती को पूरी बिजली देना है और उसके लिये विद्युत उद्योगों को लगाया जा रहा है. इसी तैयारी में राज्य में रासायनिक खाद के भी कारखाने लगने चाहिए जो राज्य की खेती की जरूरत पूरी कर सके. राज्य सरकार ने बड़े जोर-शोर से यह घोषणा भी कर रखी है कि राज्य में खेती को पूरी तरह जैविक खेती बनाया जायेगा. रासायनिक खादों की जगह जैविक (बायो) खादों का इस्तेमाल होगा, इस मामले में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है कि राज्य में कितनी खेती को रासायनिक से जैविक बना दिया गया है.

राज्य में जैविक खाद बनाने की क्या व्यवस्था की गई है, इसका क्या आकंलन किया गया है कि राज्य को कितने जैविक खाद की जरूरत है और उसका कितना उत्पादन हो रहा है. बोरलोग की हरित क्रान्ति से पहले भारत भर के किसान जैविक खाद ही जानते थे. लेकिन उससे पैदावार इतनी नहीं होती थी जो हमारी जरूरतों को पूरा कर सके. इसलिए ही उन्हें जैविक खेती से रासायनिक खेती पर लाया गया और अब फिर उन्हें जैविक खेती पर ले जाया जा रहा है. यह खेती पर निर्णय है या खेती पर शंटिग का प्रयोग हो रहा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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