जैसी आशंका हो रही थी उसी के मुताबिक रिजर्व बैंक ने अपने पूंजी व ऋण दरों को यथावत् रखा. इसका एक नतीजा तो घोषणा आते ही सामने आ गया कि व्यापारिक, औद्योगिक व शेयर बाजार फौरन और नीचे आ गए और रुपया भी डालर के मुकाबले और गिर गया. केवल एस.एल.आर (स्पेशल लेडिंग रेट) में एक प्रतिशत की कमी की गई है. लेकिन इससे भी बाजार में उत्साह नहीं दिखा.

रिजर्व बैंक सरकार का ही अंग है लेकिन स्वायत्त न होने के कारण अधीनस्थ अथारिटी है. बढ़ती जा रही मुद्रास्फीती और मूल्य वृद्धि पर यह कहा है कि यह देखना सरकार का काम है. उसने सरकार से कहा है कि वित्तीय घाटा कम करके पूंजी बाजार में उत्साह लाना जरूरी है. रिजर्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2012-13 में विकास दर 6.5 प्रतिशत रहेगी. यदि मानसून सामान्य नहीं रहता है तो कृषि क्षेत्र, राष्टï्रीय आय में बढ़ोत्री प्रभावित होगी और मूल्य वृद्धि भी होती जायेगी. सरकार के प्रयास ही निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं. देश में मुद्रास्फीती 6 से बढ़कर 7.3 प्रतिशत हो गई है.

देश में विकास दर गिरने का कारण निवेश में आई भारी कमी है.आशंकाओं के विपरीत व्यापार व उद्योग जगत को एक क्षीण आशा यह अवश्य रही कि निवेश व औद्योगिक प्रोत्साहन के लिए रिजर्व बैंक संभवत: ब्याज दरों में कटौती करेगा. ऐसा न होने से शिथिल औद्योगिक उत्पादन में और अधिक शिथिलता आ सकती है. उद्योग जगत पर यह आरोप लगता है कि वह नियमित कामकारों के स्थान पर अनुबंध पर लोगों को काम दे रहा है. उद्योग जगत का कहना है कि विश्व की देश की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि विदेश में उनका आयात व हमारा निर्यात कभी भी घट जाता है और देश में पूंजी पर ऋण 12-13 प्रतिशत रहता है. जबकि इस समय भी यूरोप व अमेरिका के केंद्रीय बैंकों की ओर से उनकी घरेलू अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत पैकेज जारी है. चीन अपने यहां सट्टेबाजारी को रोकने के लिए नियमों को सख्त कर रहा है.

भारत सरकार ने इस दिशा में अभी मात्र यह कदम उठाया है कि बाजार की आपाधापी को रोका है कि सुबह खरीदा और शाम को बेच दिया. अब यह नियम लागू किया है कि यदि कोई सौदा होता है तो उसे रद्द नहीं किया जा सकेगा. लेकिन असली समस्या सट्टा बाजार व सट्टा व्यापार की है कि माल जहां का तहां रखा रहता है. केवल भाव बढ़ाने-घटाने का खेल होता रहता है और बाजार में अकारण मूल्य उछाल आ जाता है. रिजर्व बैंक ने दूसरी बार ब्याज दरों को यथावत रखा है. कारण एक ही है कि मुद्रा स्फीति और मूल्य वृद्धि दोनों होती जा रही है. सरकार की ओर से भी अभी तक ऐसा कोई कदम नजर नहीं आ रहा है कि वह इन्हें रोकने के लिये क्या और कौन से कदम उठा रही है.

उद्योग जगत के सामने यह समस्या है कि उसे निर्या$त व्यापार में अन्य देशों की प्रतिस्पर्धा में टिकना भी है. हम सब जानते है कि चीन में ब्याज दर और पूंजी उपलब्धता भारत में ज्यादा सस्ती है. यूरोप के ग्रीस जैसे देश अभी अंतर्राष्ट्रीयसहायता ले रहे हैं. इसलिए यूरोपीय बाजार
मंदा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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