प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह, जो अब वित्त मंत्री भी हैं, ने देश के वित्तीय प्रबंधन की ओर ज्यादा ध्यान देना शुरु कर दिया है. उनका लक्ष्य है कि देश का वित्तीय घाटा (फिसकल डेफीशिट) जो 5.8 हो गया है, उसे ठीक करना है. साथ ही विदेशों से निवेश को बढ़ाकर रुपये की कीमत डालर के मुकाबले 45-48 रुपये प्रति डालर की परिधि में रखना है. वोडाफोन के मामले में दोहरे कराधान को लेकर विदेशी निवेशक भारत में निवेश के प्रति झिझक रहे हैं.

प्रधानमंत्री ने उनकी आशंका को दूर करने के लिये यह आश्वस्त किया है कि विदेशी निवेशकों को दोहरे कराधान जैसी कोई परेशानी नहीं होगी. डालर के मुकाबले रुपये का मूल्य में गिरते जाने का सबसे बड़ा कारण पेट्रो क्रूड की कीमतों का  लगातार बढऩा रहा. वहीं दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों द्वारा भारत निवेश बाजार से भारी मात्रा में अपनी पून्जी निकालना भी रहा. यूरो ऋण संकट भी एक बड़ा कारण था. लेकिन इसका प्रभाव भारत के निर्यात व्यापार पर भी ज्यादा रहा, जिससे विदेशी मुद्रा की आवक भी घटती गई.

इतने सारे कारणों के बाद भी भारत की अर्थ-व्यवस्था में वैश्विक कम्पनियों का भरोसा जमा हुआ है. वे निवेश के लिये अमेरिका और चीन के बाद भारत में ही निवेश करना चाहते हैं. अन्तरराष्टï्रीय अर्थव्यवस्था में राष्ट्रों की प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा नहीं होती है, लेकिन परोक्ष रूप से प्रभाव में हमें यह देखना होगा कि विदेशी निवेशकों की नजर में चीन को भारत से ज्यादा पसन्द किया जा रहा है. साझा सरकार की मजबूरी में अभी तक भारत सरकार चाहते हुए भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई.) और रिटेल व्यापार में विदेशी निवेश पर कोई निश्चित कदम नहीं उठा पा रही है. सरकार की इस राजनैतिक झिझक से विदेशी निवेशक भी झिझक रहा है. गत वर्ष 2011 में विदेशी निवेश बढ़ा था, लेकिन इसके आगे की स्थिति में वे चिंतित हो गये. दक्षिण पूर्व खासकर सिंगापुर में बसे अमेरिकी उद्योगपति चीन के मुकाबले भारत में निवेश को ज्यादा पसंद करते हैं.

गत वर्ष दक्षिण पूर्व में विदेशी निवेश 23 से बढ़कर 39 प्रतिशत हो गया और इसका बड़ा लाभ भारत को मिला था. चीन इस बात से काफी परेशान रहता है. प्रजातंत्रीय व्यवस्था के अभ्यस्त पश्चिमी राष्ट्र संबंधों व व्यापार में भारत के प्रति ज्यादा आकर्षित व लालायित रहते हैं. लेकिन यहां अब हर समस्या में सरकार का एक तकियाकलाम ”साझा सरकार की मजबूरी” कहना हो गया. सरकार के सहयोगी दलों को यह देखना चाहिए कि केवल सत्ता में अपना महत्व दिखाने के लिए असंगत राजनीति न करें. संयुक्त राष्ट्र की ”अंकटेड” रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय विश्व में व्यापारिक निवेश में 2012-14 की सीमा में चीन सबसे आगे है. इसके बाद क्रम में अमेरिका, भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील अन्य चोटी के पांच राष्ट्र हैं. विदेशी निवेशक भारत की खुली हुई प्रजातंत्रीय पद्धति से आश्वस्त रहते हैं. वे यहां की सरकारी लेट-लतीफी और फैसलों में अत्याधिक विलंब की व्यवस्था से त्रस्त भी हो जाते हैं. पूरे एशिया में भारत की साख सबसे भारी है. रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री सुब्बाराव का कहना है कि महंगाई पर नियंत्रण पाना बैंक की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. साथ ही उस पर व्यापार जगत का रेपो रेट घटाने के लिए भी भारी दबाव है.

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