अक्सर देखने में आता है कि मानसून के आते ही नदियां उफान पर आने लगती हैं और देश के अधिकांश भू-भागों में तबाही का तांडव मचाने लगती हैं. वैसे तो आपदाओं वह चाहे बाढ़ हो, भूकंप हो या फिर कोई अन्य,का मानव सभ्यता से आदिकाल से रिश्ता रहा है

ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार है

आपदा चाहे कोई भी क्यों न हो, उसके नाम से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जी घबड़ा जाता है, लोग थर्रा जाते हैं और पचासों आशंकायें मन को बेचैन कर देती हैं. हों भी क्यों न क्योंकि हर आपदा न केवल करोड़ों की सम्पत्ति के नुकसान का कारण बनती है. बल्कि उसमें हजारों-लाखों जिंदगियां हमेशा के लिए खत्म भी हो जाती हैं. बाढ़ एक ऐसी ही आपदा है जिसमें हर साल करोड़ों रूपयों का नुकसान ही नहीं होता बल्कि हजारों-लाखों घर-बार तबाह हो जाते हैं, लहलहाती खेती बर्बाद हो जाती है और अनगिनत मवेशियों के साथ इंसानी जिंदगियां पल भर में अनचाहे मौत के मुंह में चली जाती हैं.

एक शोध से यह साबित हो चुका है कि पिछले तीन दशक में देश में चार-सवा चार अरब से भी ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए  हैं. अक्सर देखने में आता है कि मानसून के आते ही नदियां उफान पर आने लगती हैं और देश के अधिकांश भू-भागों में तबाही का तांडव मचाने लगती हैं. वैसे तो आपदाओं वह चाहे बाढ़ हो, भूकंप हो या फिर कोई अन्य, का मानव सभ्यता से आदिकाल से रिश्ता रहा है. इसमें भी दो राय नहीं कि सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ और जब-जब बाढ़ ने विकराल रूप धारण किया, नदियों के किनारे बसी बस्तियां बाढ़ के प्रकोप का शिकार हुयीं और नेस्तनाबूद हो गयी. यही नहीं नदियों के प्रवाह क्षेत्र में हरे-भरे खेत भी उसकी चपेट में आकर तबाह हो गए. नतीजन मानव जीवन हर साल कमोवेश बाढ़ की विभीषिका को सहने को बाध्य हो गया. देखा गया है कि पिछले कुछ वर्षों से बाढ़ ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है.

भले बीते दशकों की तुलना में पिछले कुछ वर्षों में बारिश की मात्रा में कमी आई है लेकिन बाढ़ से होने वाली तबाही लगातार तेजी से बढ़ती ही जा रही है. जबकि नदी विशेषज्ञ नदियों में जल की मात्रा घटते जाने से चिंतित नजर आ रहे हैं. एक समय सूखे की मार झेलता राजस्थान का मरू इलाका भी अब नदियों के कोप का शिकार हो रहा है. बीते बरस इसकी गवाही देते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि जो इलाके कुछ समय पहले तक बाढ़ के प्रकोप से अछूते थे, आज वे भी वहां की नदियों में आ रहे उफान से तबाह हो रहे हैं.

असल में बाढ़ की समस्या वैसे तो सभी क्षेत्रों में है लेकिन मुख्य समस्या गंगा के उत्तरी किनारे वाले क्षेत्र में है. गंगा बेसिन के इलाके में गंगा के अलावा यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन और महानंदा आदि प्रमुख नदियां हैं जो मुख्यत: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार सहित मध्य एवं दक्षिणी बगांल में फैली है. इनके किनारे घनी आबादी वाले शहर बसे हुए हैं.

इस सारे इलाके की आबादी अब 40 करोड़ से भी ऊपर पहुंच गई है और यहां की आबादी का घनत्व 500 व्यक्ति प्रति किमी का आंकड़ा पार कर चुका है. उसका परिणाम है कि आज नदियों के प्रवाह क्षेत्र पर दबाव बेतहाशा बढ़ रहा है, उसके ‘बाढ़ पथÓ पर रिहायशी कालोनियों का जाल बिछता जा रहा है, नदी किनारे एक्सप्रेस वे व दिल्ली में यमुना किनारे खेल गांव का निर्माण इसका सबूत है कि सरकारें भी इस दिशा में कितनी संवेदनहीन हैं. यह सिलसिला अब भी जारी है.

यह होड़ थमने का नाम नहीं ले रही है. इसमें दो राय नहीं कि हिमालय से निकलने वाली वह चाहे गंगा नदी हो, सिंध हो या ब्रह्मपुत्र या फिर कोई अन्य या उसकी सहायक नदी, उनके उद्गम क्षेत्रों की पहाड़ी ढलानों की मिट्टी को बांधकर रखने वाले जंगल विकास के नाम पर जिस तेजी से काटे गए, वहां बहुमंजिली इमारतों रूपी कंक्रीट के जंगल, कारखाने और सड़कों के जाल बिछा दिए गए, विकास का यह रथ आज भी निर्बाध गति से जारी है. नतीजन इन ढलानों पर बरसने वाला पानी बारहमासी झरनों के माध्यम से जहां बारह महीनों इन नदियों में बहता था, अब वह ढलानों की मिट्टी और अन्य मलबे आदि को लेकर मिनटों में ही बह जाता है और अपने साथ वहां बसायी बस्तियों को खेतों के साथ बहा ले जाता है. दरअसल इससे नदी घाटियों की ढलानें नंगी हो जाती हैं.

उसके दुष्परिणाम रूवरूप भूस्खलन, भूक्षरण, बाढ़ आती है और बांधों में साद् का जमाव दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है. जंगलों के कटान के बाद बची झाडिय़ां और घांस-फूस चारे और जलावन के लिए काट ली जाती हैं. इसके बाद ढलानों को काट-काट कर बस्तियों, सड़कों का निर्माण व खेती के लिए जमीन को समतल किया जाता है. इससे झरने सूखे, नदियों का प्रवाह घटा और बाढ़ का खतरा बढ़ता चला गया. दरअसल हर साल दिन-ब-दिन बढ़ता बाढ़ का प्रकोप इसी असंतुलन का नतीजा है.

इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि स्वार्थ की खातिर पहले अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, फिर आजादी के बाद देश में विकास के नाम पर जिस तेजी से जंगलों का कटान किया गया, उसी के कारण नदी घाटी क्षेत्र की ढलानों की बरसात को झेलने की क्षमता भी टूटी है, सच कहे तो अब वह खत्म हो चुकी है. यह भी कि नदियों के जलागम क्षेत्रों के जंगलों से ढका होने से बाढ़ का प्रकोप किसी हद तक कम जरूर हो सकता है, इसमें दो राय नहीं है. जबकि यह भी कड़वा सच है कि नदियों के जलागम क्षेत्र की जमीन जंगलों के कटान के चलते जब नंगी हो जाती है, तो उस हालत में मिट्टी साद के रूप में नदी की धारा में जमने लगती है. मैदानी इलाकों में यह साद नदियों की गहराई को पाट कर उनकों उथला बना देती है.

नतीजन बरसात के पानी का प्रवाह नदी की धारा में समा नहीं पाता और फिर वह आस-पास के इलाकों में फैलकर बाढ़ का रूप अख्तियार कर लेता है. जहां तक गंगा, यमुना और अन्य नदियों का प्रश्न है, अधिकांश का पानी मैदानी क्षेत्रों में खेती आदि के लिए सिंचाई की खातिर नहरों के जरिये निकाला जाता रहा है. इसके कारण नदियों में पानी न के बराबर रहता है जिसकी वजह से नदियां साद को समुद्र तक बहा ले जाने में नाकाम रहती हैं. नदी की धाराओं में मिट्टी के जमने और उनमें गहराई के अभाव में पानी कम रहने से वे सपाट हो जाती हैं. एक और बात तो यह कि नदियों के किनारे अब न तो हरियाली बची है, न पेड़-पौधे. जब पेड़-पौधे रहेंगे ही नहीं तो उनकी जड़ें मिट्टी कहां से बांधेंगी. और जब बारिश आती है तो बरसात का पानी नदी की धाराओं में न समाकर आस-पास फैलकर विकराल बाढ़ का रूप धारण कर लेता है.

अभी तक हमारे यहां नदी प्रबंधन के नाम पर बांधों, बैराजों, पुश्तों का निर्माण और सिंचाई के लिए नहरें निकालने का काम तीव्र गति से हुआ है और इसी को विकास की संज्ञा दी गई है. इसमें भी दो राय नहीं कि इस काम में हमारा देश चीन, पाकिस्तान आदि अन्य देशों के मुकाबले शीर्ष पर है. जहां तक नदी किनारे बंधान-तटबंधों के निर्माण का सवाल है, वह नदी की धारा को रोके रखने के मामले में नाकाम साबित हुए हैं. कोसी और केन के तटबंध-छोटे-छोट बंध इसका ज्वलंत उदाहरण हैं जो इन नदियों के रौद्र रूप को बांधे रखने, उन पर अंकुश लगाने में नाकाम रहें हैं. इसलिए अब जरूरी हो गया है कि मौसम के बदलाव को मद्देनजर रख कर नदियों की प्रकृति का सूक्ष्म रूप से विश्लेषण किया जाये, उनका अध्ययन किया जाये और उसी के तहत नदी प्रबध्ंान की तात्कालिक व्यवस्था की जाये. यह ध्यान में रखते हुए कि बाढ़ महज प्राकृतिक प्रकोप नहीं है, वह मानवजनित कारणों से उपजी एक भीषण त्रासदी है. इसके लिए प्रशासनिक तंत्र को चुस्त-दुरुस्त बनाना बेहद जरूरी है, तभी इस विभीषिका पर किसी हद तक अंकुश की बात सोची जा सकती है अन्यथा नहीं.
गौरतलब है कि दो वर्ष पूर्व बिहार में कोसी नदी की प्रलयंकारी बाढ़ जिसमें तकरीब डेढ़-पौने दो करोड़ लोग बेघर हुए, उनके खेत-खलिहान तबाह हुए, और हजारों काल के गाल में समा गए, के बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा था कि बाढ़ की विभषिका से बचने की दिशा में नदी प्रबंधन के काम को प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है क्योंकि इसके सिवाय हमारे पास कोई चारा ही नहीं है. लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया है और देश फिर बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहा है. हालात गवाह हैं कि बाढ़ तो अब देशवासियों की नियति बन चुकी है. इस बाढ़ के ताडंव का हर साल सामना करने को जनता विवश है.

सरकारें बाढ़ आने पर हर साल राहत का ढिंढोरा पीट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं और फिर चैन की नींद सो जाती है. नदी प्रबंधन अभी भी दूर की कौड़ी है. जब तक ऐसा नहीं होगा, बाढ़ के दानव के हर साल शिकार होकर लाखों लोग अनचाहे मौत के मुंह में जाते रहेंगे, बेघरबार होकर दर-दर भटकते रहेंगे और हर साल राहत राशि से अपनी तिजोरियां भर नेता-नौकरशाह-अधिकारी मालामाल होते रहेंगे. उनके लिए बाढ़ तो उनके विकास का जरिया बन कर रह गई है. इसमें दो राय नहीं.

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