मुंबई. जिंस बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग एक विकल्प की तलाश कर रहा है, जिसके तहत वह एक्सचेंजों से कहेगा कि वह ब्रोकरों को गवर्नेंस से दूर रखे। मौजूदा समय में जिंस एक्सचेंजों के शेयरधारकों को एक्सचेंज पर कारोबार करने की अनुमति नहीं है। मौजूदा वायदा अनुबंध विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत 1 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी वाला कोई भी कारोबारी एक्सचेंज के बोर्ड में कोई पद हासिल नहीं कर सकता और यहां तक कि ब्रोकरों को भी उन एक्सचेंजों पर कारोबार की अनुमति नहीं है जहां उसकी हिस्सेदारी 1 फीसदी से ज्यादा है।

अगर हिस्सेदारी चाहिए तो फिर उसे एक्सचेंज की सदस्यता का समर्पण करना पड़ता है। स्टॉक एक्सचेंजों पर हालांकि उसके शेयरधारक कारोबार कर सकते हैं, लेकिन ब्रोकरों को स्टॉक एक्सचेंजों के गवर्नेंस से दूर रखा जाता है और वह एक्सचेंज के बोर्ड में कोई पद हासिल नहीं कर सकता। संपर्क किए जाने पर एफएमसी के प्रवक्ता ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन सूत्रों ने कहा कि पूंजी बाजार के चलन और एनसीडीईएक्स के अनुभव मुताबिक गवर्नेंस से ब्रोकरों को दूर रखने पर विचार किया जा रहा है। एनसीडीईएक्स में एक ब्रोकर को एक्सचेंज के एंकर शेयरधारक के तौर पर शामिल किया गया था। गौरव अरोड़ा प्रवर्तित जेपी कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड एंकर इन्वेस्टर है और इसके पास देश के सबसे बड़े कृषि जिंस एक्सचेंज एनसीडीईएक्स की 22.38 फीसदी हिस्सेदारी है। जेपी कैपिटल को 7 अक्टूबर 2010 को एनसीडीईएक्स के एंकर इन्वेस्टर के तौर पर शामिल किया गया था और 59 रुपये की भारी छूट पर उसे 113.4 लाख शेयर आवंटित किए गए थे, तब इसकी कीमत 110 रुपये प्रति शेयर थी।

जेपी कैपिटल को इस शर्त पर शेयर दिए गए थे कि वह एक्सचेंज का औसत मासिक कारोबार लगातार तीन महीने में बढ़ाकर क्रमश: 7000 करोड़ रुपये, 12,000 करोड़ रुपये और 16,000 करोड़ रुपये कर देगी। उस समय एक्सचेंज का कारोबार 3000 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2010-11 व 2011-12 में जेपी यह लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रही। अप्रैल व मई 2012 में एनसीडीईएक्स का औसत कारोबार 5600 करोड़ रुपये था। समझौते के मुताबिक, अगर एक्सचेंज का कारोबार लक्ष्य के मुताबिक नहीं बढ़ेगा तो फिर जेपी कैपिटल को शेयरों की कीमत के अंतर के तौर पर 113 करोड़ रुपये अक्टूबर 2013 में चुकाने होंगे। ऐसा नहीं होने पर एक्सचेंज दूसरा एंकर इन्वेस्टर तलाश लेगा। अगर एफएमसी ब्रोकरों को गवर्नेंस से दूर रखने का फैसला लेता है तो पहली गाज जेपी पर गिरेगी। एफएमसी ने हालांकि कोई फैसला नहीं लिया है, लेकिन इस मसले पर नियामक के भीतर ही असहजता है क्योंकि शेयरधारक के तौर पर व कारोबार में इजाफे के लिहाज से ब्रोकरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

एनसीडीईएक्स के प्रमुख एम के आनंद कुमार ने कहा – गवर्नेंस में ब्रोकरों की भूमिका को लेकर वे एमएमसी की सोच से वाकिफ हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि जेपी और इसकी संबंधित इकाइयों को एक्सचेंज पर कारोबार से रोक दिया गया है। हालांकि जब जेपी को एंकर इन्वेस्टर के तौर पर शामिल करने का फैसला बोर्ड में हुआ था तब सार्वजनिक  कंपनियों एलआईसी, नाबार्ड, पंजाब नैशनल बैंक और केनरा बैंक के प्रतिनिधि मौजूद थे।
जेपी कैपिटल के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी जिंस ब्रोकर नहीं है और एमएमसी के दिशानिर्देशों के मुताबिक हमने शेयरों का विनिवेश एनसीडीईएक्स के अन्य सदस्यों को किया है।

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