यह एक अच्छी खबर तो कही जा सकती है कि गेहूं, प्याज, आलू व अन्य सब्जियों के बढ़ते उत्पादन के कारण गत 6 वर्षों में पहली बार जनवरी 2012 में खाद्यान्न की मुद्रास्फीति घटकर शून्य से भी नीचे 3.36 प्रतिशत पर आ गई है. इसका आंकलन 24 दिसंबर 2011 के सप्ताहांत की अवधि में निर्धारित किया गया है. प्याज में 73.74 प्रतिशत, आलू में 34.01 प्रतिशत अन्य सब्जियों में 50.22 प्रतिशत और गेहूं में 3.41 प्रतिशत भाव गिरावट दर्ज की गई है. लेकिन यह बुरी खबर ही कहा जाना चाहिए कि सट्टïा बाजार की उछल कूद में खाद्य तेलों के भाव 10 प्रतिशत, दूध 13.82 प्रतिशत और दालें 13.85 प्रतिशत महंगी हो गई. आलू, प्याज की यह हालत हो गई है कि गुजरात, पंजाब व उत्तर प्रदेश में अत्याधिक भाव गिर जाने के कारण इनके किसान इन वस्तुओं को सड़क पर फेंक रहे हैं. खेती की अर्थव्यवस्था में हमेशा यही होता है कि यदि किसी साल किसी वस्तु के भाव चढ़ जाते हैं और काफी मुनाफा हो जाता है तो उसके अगले साल उसकी खेती का रकबा बहुत ज्यादा बढ़ा दिया जाता है और फसल अत्याधिक उपज की श्रेणी में आ जाती है. पिछले साल इसी अवधि में प्याज 60 रुपये किलो बिका था. इस साल इसी अवधि में प्याज के भाव गिरने से फेंका जा रहा है. लहसुन जो 200 रुपये किलो तक बिका था वह 80 रुपये किलो पर आ गया है. प्याज 10-12 रुपये किलो रिटेल में चल रही है.

पिछले साल 20 किलो प्याज का कट्टा 124 से 140 रुपये तक बिका. इस समय बम्पर फसल से वह गिरकर 45-55 रुपये प्रति 20 किलो हो गया. गुजरात में देश की सर्वाधिक प्याज की खेती अकेले सौराष्टï्र अंचल में 60,000 हेक्टेयर में होती है. आलू पंजाब में सबसे ज्यादा 80,000 हेक्टेयर में होता है. इस वर्ष आलू की फसल इतनी ज्यादा हो गई कि उसका भाव गिरकर 1 रुपया प्रति किलो हो गया. इस पर किसान की लागत प्रति किलो आलू पर 5 रुपये आयी है.
विरोध प्रदर्शन में किसानों ने पंजाब व हरियाणा में आलू सड़कों पर फेंक दिया. किसानों द्वारा बाहर भेजने पर भी ट्रक का माल भाड़ा तक नहीं निकल रहा. अभी सरकार ने ढुलाई में घरेलू बिक्री में 50 पैसे और निर्यात के लिये ढुलाई पर 1 रुपया 50 पैसे सब्सिडी दी है. केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शरद पवार का यह कहना है कि सब्जियां जल्दी खराब होने वाली (Parishable) होती है. इसलिए न तो उनका समर्थन मूल्य हो सकता है और न ही सरकार उसे खरीदेगी. क्योंकि इनका भंडारण नहीं होगा.

इसलिए अगर कहीं कुछ खाद्यान्न वस्तुओं के भाव गिरे है तो कुछ के भाव बढ़ भी गये है. ऐसे में उपभोक्ता की नजर में यह सिर्फ सरकारी आंकड़ों में हुई उपलब्धि ही है, उसको कोई राहत महसूस नहीं हो रही है. जब उत्पादन बढ़ता है तो निर्यात खोल दिया जाता है और देश में भाव बढ़ जाते है. अभी तक की कृषि नीति में कोई भाव स्तर व भाव नीति ही नहीं है जिसकी तुलना में वस्तुओं का उत्पादन और मूल्य तुलनात्मक स्तर व नीति बनार्यी जा सके. सट्टा बाजार व व्यापार भावों को सबसे ज्यादा तहस-नहस कर देता है. एन.डी.ए. की वाजपेयी सरकार से पहले कांग्रेस सरकारों द्वारा सट्टï को 7 साल बंद रखा गया. लेकिन वाजपेयी सरकार ने उसे खोल दिया था जो अभी तक चला ही आ रहा है. केंद्रीय खाद्य मंत्री श्री शरद पवार का हर बयान सट्टï का हित पोषण करता है. सोयाबीन और सोया तेल की तेजी के लिये सट्टा बाजार जिम्मेदार है. बड़े स्टाकिस्टों के पास सस्ते में खरीदे गये सोयाबीन का भंडार लगभग 25 लाख टन है. ये सोयाबीन की मंडियों में आवक रोककर कमी पैदा कर रहे हैं, ताकि इसके भाव बढ़ जाए.  भारत खाद्य तेलों की मांग की 55 प्रतिशत पूर्ति विदेशों से तेल आयात से करता है. सरसों तेल 90 से 100 रुपये किलो बिकने लगा है. 1 दिसंबर 2011 में 8 हजार टन सोया तेल आयात हुआ. इसी जनवरी में 20 हजार टन आयात हो रहा है और फरवरी में यह बढ़कर 1 लाख टन हो जायेगा. तेल बाजार सटोरियों के कब्जे में चला गया है और भाव 20 प्रतिशत तक बढ़ गये हैं.

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