अमेरिका की ‘टाइम’ पत्रिका ने श्री मनमोहन सिंह को ऐसा प्रधानमंत्री बताया है कि जो उनके शासन में लक्ष्य हासिल नहीं कर सका और वे असफल हैं. नजरिया सबका अपने-अपने दृष्टिïकोण से होता है. अमेरिका के साथ ही यही बात है. वहां का उद्योग-व्यापार जगत इस बात के लिए आतुर बैठा है कि भारत सरकार बड़े क्षेत्रों में व रिटेल बाजार मे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आर.) मंजूर करे. यू.पी.ए. की सरकार, भारत के अर्थशा व उद्योग-व्यापार के शीर्ष उद्यमी सभी यही चाहते हैं कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को फौरन अनुमति दी जाए. लेकिन भारत में ये न सिर्फ केंद्र में साझा सरकार है बल्कि कई राज्यों में मध्यप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार में ऐसे दलों की सरकारें हैं, जो यू.पी.ए. संगठन के बाहर दूसरे गठबंधन या पृथक अस्तित्व में हैं.

केंद्र ने रिटेल व्यापार में विदेश प्रत्यक्ष निवेश को कुछ शर्तों के साथ अनुमति की घोषणा भी कर दी. लेकिन कई मुख्यमंत्रियों श्री शिवराज सिंह चौहान, जयाललिता, श्री नीतेश कुमार, श्री नवीन पटनायक के साथ स्वयं यू.पी.ए. में शामिल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक स्वर में यह कह दिया कि वे अपने राज्यों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को नामंजूर करते हैं. इन्हीं परिस्थितियों में केंद्र को यह फैसला स्थगित करना पड़ा. बहुत हद तक यही निष्कर्ष निकलता है कि अमेरिका की बिजनेस लॉबी को यह फैसला निवेश अवसर में घाटे का लगा. टाइम, न्यूज वीक जैसी पत्रिकाएं भी अपने देश के हित या पक्ष में सोचती हैं. हमारे सामने सवाल यह उठता है कि अगर हमारे देश की कोई ऐसी पत्रिका अमेरिका के राष्टï्रपति या अन्य किसी विकसित देश के शासनाध्यक्ष के बारे में ऐसी कटु आलोचनात्मक निष्कर्ष रिपोर्ट छापें तो क्या उस देश के संचार माध्यम या लोग उसे इतना महत्व व प्रकाशन देंगे जैसे ‘टाइमÓ की रिपोर्ट को यहां दिया जा रहा है.

कुछ दशकों पूर्व इसी ‘टाइमÓ पत्रिका ने अपने कवर पेज भारत की साधारण स्तर की अभिनेत्री ‘परवीन बॉबीÓ का फोटो कवर पेज बनाते हुए भारत की सर्वश्रेष्ठï अभिनेत्री लिखा था जबकि उसकी यहां ऐसी कोई ‘केटेगरीÓ नहीं थी. श्री मनमोहन सिंह की सरकार एफ.डी.आई. पर चाहते हुए भी निर्णय नहीं कर पाई. इसे हम भारतवासी अपने यथार्थ व नजरिये से समझते हैं. वह कितने सफल व असफल है इसका निर्णय ‘टाइमÓ की रिपोर्ट नहीं बल्कि हमारे 2014 के लोकसभा चुनाव करेंगे. जहां तक भ्रष्टïाचार का सवाल है अमेरिका के राष्ट्रपति श्री रिचर्ड निक्सन को इसीलिए हटाया गया था. उनके खिलाफ जाँच भी इसलिए नहीं की गई क्योंकि उन्हें उनके बाद उपराष्टï्रपति से राष्टï्रपति बने गेराल्ड फोर्ड ने ‘माफीÓ दे दी थी. उन्हें व्यक्तिगत अपराध में नहीं बल्कि भ्रष्टïाचार में माफी थी. राष्टï्रपति बिल क्लिंटन पर अपने स्टाफ की महिला मेनेवेन्सकी से अय्याशी के आरोप लगे थे, उसे भी नजरअंदाज किया गया था.
वैसे यह एक पत्रिका की रिपोर्ट है. लेकिन इसके अलावा अभी तक संयुक्त राष्टï्र व अन्य प्रतिष्ठिïत संगठनों की रिपोर्ट आती रही है.

उसमें भारत को एशिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था कहा गया है. निवेशकों की नजर में भारत चोटी का ‘डेस्टीनेशन’ है. वह सार्क, ब्रिक्स, आसियान जी-20 जैसे आर्थिक महत्व के संगठनों का प्रभावशाली सदस्य है. जहां तक मंदी का सवाल है उससे यूरो जोन के राष्ट्र लडख़ड़ाए हैं और उसका असर विश्व के आयात-निर्यात व्यापार पर बहुत ही प्रतिकूल व प्रतिगामी रहा. उसे ऋण संकट से निपटने के लिये अभी भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के जरिये 40 करोड़ रुपये डालर की आर्थिक मदद की है.

ऐसे अंतर्राष्ट्रीय माहौल में हमारे राजनैतिक दलों को खास कर सरकार के सहयोगियों को अपने आचरण पर आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या राजनीति देशहित में है. ममता हर बात में ‘नखरे’ दिखा रही हैं. रेल बजट के चलते रेल मंत्री बदलने का नाटक कर डाला. एक अन्य समर्थक द्रुमक के करुणानिधि भी बाल ठाकरे  की तरह तमिलभाषायी मुद्दा उठाकर भारत को अकारण ‘लिट्टï के समर्थन में पड़ोसी राष्ट्र श्रीलंका का दुश्मन बना रहा है. जबकि लिट्टï आज तक भारत में भी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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