गीता के अनुसार ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने की विधी भी एक है

भोपाल, 17 नवम्बर. लाल चक्रधर सिंह आश्रम भक्त एवं मप्र. प्रभारी गीता प्रचारक ने कहा कि गीता के अनुसार कल्प के प्रारंभ में एवं सृष्टि के आरंभ में आज से लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व गीता का प्रादुर्भाव हुआ, यह साक्षात परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है जिसे 5200 वर्ष पूर्व महर्षि वेद व्यास ने लिपीबद्घ किया था.

उस समय तक भी कोई सम्प्रदाय (कथित धर्म) अस्तित्व में ही नहीं थे. गीता मानव का आदि एवं प्रथम धर्म शास्त्र है. गीता के अनुसार ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने की विधी भी एक है. प्रभू संरक्षण में चलते हुए यदि प्राप्ति (सिद्घि) हो गई तो उपलब्धी भी एक जैसी है. भगवत्पथ में कोई कोई सम्प्रदाय हो ही नहीें सकता. इसलिये प्रत्येक महापुरूष को एक परमात्मा की ही अनुभूति हुई. एवं उन्होने अपने कबीलाई भाषा में उसे भगवान, अल्लाह खुदा, गॉड, आदि संबोधन दिया. तथा उन महापुरूषों के अनुयायी परवर्ती समाज ने उन महापुरूषों के मार्ग को सम्प्रदाय में बदल दिया. सम्प्रदाय गुरू घरानों के ट्रेडमार्क है. सम्प्रदाय धर्म नही हो सकता धर्म तो एक ही है, धर्म कभी परिर्वतनशील नहीं होता. गीता की आध्यत्मिक विद्या के कारण ही भारत विश्व गुरू रहा है एवं पूरा विश्व भारत की आध्यात्मिक विद्या का ऋणी है.

विश्व मानव एक मात्र गीता है. गीता को किसी सम्प्रदाय विशेष से जोडऩा पूर्णत: अनुचित है. गीता को अमेरिका न्यूजर्सी के सेटन हाल युनिवर्सिटी ने गत वर्ष से पाठ्यक्रम में अनिवार्य कर दिया है. महात्मा गांधी ने स्कूल शिक्षा में गीता पढऩे को प्रा्रथमिकता देने हेतु बल भी दिया था. केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में चाचा नेहरू के भारत की खोज एवं बाल महाभारत के माध्यम से लागू भी है. विश्व मानव धर्म के प्रति व्याप्त भ्रांति को परमहंश सिद्घ संत विश्वगुरू साक्षात योगेश्वर स्वामी अडगड़ानंद जी महाराज ने मानव धर्म शास्त्र गीता की विस्तृत व्याख्या गीता भाष्य, याथार्थ गीता,, के माध्यम से विश्वमानव में धर्म के प्रति व्याप्त भ्रांति को दूर करते हुए अपने प्रवचनों मेंं बताया कि विश्व का मानव आदि पुरूष महाराज मनु की संतान एवं वंश परम्परा में होने के नाते सभी राजपूत है. जातियॉ, कबीले, परमात्मा ने नही बल्कि महापुरूषों के परवर्ती समाज ने बनाया है. संम्प्रदायों में उपासना स्थल मंदिर, मस्जिद, चर्च, आदि आध्यात्मिक आस्था की प्रारंभिक कक्षाएं है. यहीं से विभिन्न समाज एवं कबीलों के मनुष्य आध्यात्मिक विद्या सीखने में प्रवेश लेते है. उस महापुरूष का महात्म्य जानते है, एवं विभिन्न विद्याओं से एक ही परमात्मा के सत्य का पाकार ही नाम का भजन करते हुए आत्मा एवं परमात्मा से साक्षात्कार कर आध्यात्म सिद्घि प्राप्त करते है. इश्वर प्राप्ति की विद्या ही धर्म है. धर्म में भेदभाव को स्थान नहीं है. न ही धर्म परिवर्तनशील है.

आदि मानव शास्त्र गीता के लेखन के काफी समय बाद ही विभिन्न महापुरूषों के परवर्ती समाज द्वारा रचित समस्थ ग्रंथ गीता के ही अनुवाद है. गीता मानव जीवन दर्शन है. गीता मानव जीवन में नैतिक चारित्रिक प्रबंधकीय आदि गुणों का समावेश कराती है. गीता को पाठ्यक्रम में लागू होने से समाज में उंचनीच गरीब अमीर धर्म अधर्म जाति कुजाति आदि भेदभाव स्वात:समाप्त होकर मानव समाज में समाज में सम्प्रादायिक सौहार्द बढ़ेगा. पूज्य स्वामी अडगडानंद महाराज द्वारा भारत की सभी भाषाओं एवं विश्व की अंगे्रजी, उर्दू, स्पेनिश, फ्रेन्च, आदि भाषाओं याथार्त गीता के प्रसारण के कारण ही विश्वसमुदाय स्वत: गीता को जीवन में अपना रहा है. निष्काम योग कर्म सीख रहा है. एवं जीवन के उच्च मानवीय मूल्यों को प्राप्त कर रहा है. अरब देश में स्वामी जी का प्रवचन हुआ अमेरिका एवं युरोप गीता अपना रहा है, वहीं भारत की देव भूमि में जन्मी गीता का भारत में ही विरोध होना विश्वमानव समुदाय में अनुचित संदेश देता है. भारत में यदि गीता लागू करने हेतु मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के समस्त शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रमों में गीता लागू करने से शुरूआत करते है, तो इस प्रेरणा का मॉ भारती के समस्त सपूतों के द्वारा देश का गौरव मानते हुए सर्वथा सम्मान और अभिनन्दन करना चाहिए.

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