यह भी एक यथार्थ है कि शासकीय मेडिकल कॉलेज और शासकीय अस्पतालों के डॉक्टरों का रुझान उनकी प्राइवेट प्रेक्टिस पर ज्यादा रहता है और वे शासकीय पद का भी उसे बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं. कुछ समय पूर्व भोपाल के शासकीय जे.पी. अस्पताल के डाक्टर अस्पताल में ड्यूटी के समय अपने प्राइवेट क्लीनिक में काम कर रहे थे. जब सरकार प्राइवेट प्रेक्टिस पर रोक लगाती है तो मेडिकल कॉलेज व अस्पतालों के कई डाक्टर सेवा से इस्तीफा देकर चले जाते हैं. मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही हुआ और इसका परिणाम यह हुआ कि कई मेडिकल कालेजों में पढ़ाने वाले प्रोफेसर डाक्टरों का टोटा हो गया. मेडिकल की पढ़ाई का स्तर गिरने लगा. मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया ने मेडिकल कालेजों में स्तरहीनता पाई और उनमें एडमिशन बन्द करने की चेतावनी दे डाली.

राज्य सरकार ने भी मेडिकल कालेजों के डॉक्टरों के साथ ज्यादती कर दी. एक तो प्राइवेट प्रेक्टिस बन्द कर दी दूसरी ओर उनको वह वेतनमान भी नहीं दिया जा रहा था, जो यू.पी.सी. ने उनके पदनाम के लिये तय किया था. नतीजा यही हुआ कि शासकीय मेडिकल व अस्पताल योग्य डॉक्टरों से वंचित हो गये. राज्य सरकार इस दिशा में यह महत्वपूर्ण निर्णय लेने जा रही है कि मेडिकल कालेज के प्रोफेसर व अन्य डॉक्टरों को यू.जी.सी. का वेतनमान दिया जाए. इससे अध्यापन वर्ग के हर संवर्ग के पद पर 20 हजार रुपये बढ़ जायेंगे. इससे निश्चित ही योग्य व पढ़ाने वाले डाक्टर राज्य के मेडिकल कालेजों की तरफ आने लगेंगे. इस मामले में भी खोजबीन से यही पता चला था कि शिक्षक वर्ग के डॉक्टरों को मिलने वाला वेतनमान काफी कम था. इसलिये उनका रुझान खुद का हास्पिटल, प्राइवेट प्रेक्टिस व निजी मेडिकल कालेजों व अस्पतालों की तरफ हो गया है और शासकीय मेडिकल कालेज लगातार अवनति की तरफ जा रहे हैं.

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