16pic2नई दिल्ली,  मरकर भी जिंदा है राम. महाराष्ट्र के अकोला से एक ऐसी खबर जो मिसाल बन गई है. राम की सांसें तो चल रही थीं लेकिन वो जिंदगी जी पाएगा या नहीं इसकी उम्मीद खत्म हो गई थी. घरवालों ने कलेजा पत्थर का कर लिया और अपने घर के चिराग से तीन घरों में रोशनी कर दी.

राम के घरवालों ने अपने 25 साल के बेटे के सारे अंग दान करने का फैसला कर लिया था. रात करीब दो बजे का वक्त हो रहा था पूरा औरंगाबाद शहर नींद में था लेकिन अस्पताल

के डॉक्टर, पुलिस और एयरपोर्ट के कर्मचारी जाग रहे थे. मकसद एक था तीन जिंदगियों को बचाना और बचाने वाले का नाम था राम.
ये अकोला में रहने वाले 25 साल के युवक राम मगर की कहानी है. 12 जनवरी को राम बाइक से इंटरव्यू के लिए जा रहा था. स्पीड ब्रेकर पर बाइक का बैलेंस बिगड़ा और राम का एक्सीडेंट हो गया. राम को औरंगाबाद के एमआईटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उसको ब्रेनडेड बताया गया. ब्रेनडेड यानि ऐसी स्थिति जिसमें दिमाग की मौत हो चुकी होती है और सिर्फ सांसें चल रही होती हैं. मतलब इंसान कभी ठीक नहीं हो सकता. डॉक्टरों ने घरवालों को बताया कि चाहे जितना पैसा खर्च कर लो राम का ठीक होना मुश्किल है. अस्पताल में मौत के बीच बेटा झूल रहा था लेकिन परिवार ने एक मुश्किल फैसला किया. परिवार ने राम के अंगदान का फैसला किया.

राम के अंगदान के लिए उसे औरंगाबाद के ही सिग्मा अस्पताल में भर्ती कराया गया. राम की एक किडनी तो औरंगाबाद के ही धूत अस्पताल में मरीज को लगाने के लिए भेज दी गई जबकि दूसरी किडनी और लिवर को सुबह 5 बजकर 38 मिनट पर मुंबई के लिए भेजा गया. अस्पताल से एयरपोर्ट तक का रास्ता सुनसान था. 11 किलोमीटर का रास्ता 4 मिनट में तय किया गया. राम का लिवर मुंबई के ग्लोबल अस्पताल ले जाए गए और यहां एक मरीज को इसे लगाया गया. राम की दूसरी किडनी जसलोक अस्पताल में मरीज को लगाई गई और उसकी जान बच गई.

राम के अंग तीन लोगों की जान बचा चुके थे लेकिन उनका हार्ट किसी को नहीं लगाया जा सका क्योंकि उसे चेन्नई भेजने के लिए हवाई जहाज का इंतजाम नहीं हो सका. राम की सांसें चल रही थी और ऐसे में उनके अंगदान करना – ये बहुत मुश्किल फैसला था खासकर एक मां के लिए. लेकिन राम के घरवालों ने ये साहस दिखाया जो पूरे समाज के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है. मरकर भी तीन लोगों में जिंदा है राम.

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