जनरल के उम्र विवाद पर सुप्रीमकोर्ट के सरकार से ही सवाल

नई दिल्ली, 3 फ रवरी. ऐसा लगता है कि सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने आयु गतिरोध पर पहले दौर की कानूनी लड़ाई जीत ली है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि जिस तरीके से उनकी वैधानिक शिकायत को खारिज किया गया है वह दुर्भावना से ग्रस्त लगता है.

न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को तय करते हुए यह जानना चाहा कि क्या सरकार 30 दिसंबर 2011 के अपने आदेश का वापस लेना चाहेगी. रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने 30 दिसंबर को एक आदेश जारी किया था जिसमें जनरल सिंह की उस वैधानिक शिकायत को खारिज कर दिया गया था. इसमें कहा गया था कि सेना के रिकार्ड में उनकी जन्मतिथि को 10 मई 1950 नहीं बल्कि 10 मई 1951 माना जाए. न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा और न्यायमूर्ति एच एल गोखले की पीठ ने सरकार पर प्रश्न उठाए. पीठ का मानना था कि रक्षा मंत्रालय का 21 जुलाई 2011 का वह आदेश अटार्नी जनरल की राय पर आधारित था जिसमें जन्मतिथि को 10 मई 1950 माना गया था. जब न्यायालय ने पूछा कि क्या सरकार 30 दिसंबर का अपना आदेश वापस लेना चाहेगी अटार्नी जनरल जी ई वाहनवती ने कहा कि वह इस मुद्दे पर सरकार के निर्देश प्राप्त करेंगे.

न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार 30 दिसंबर के अपने आदेश को वापस ले लेती है तो जनरल सिंह के समक्ष अन्य उपाय उपलब्ध हैं. न्यायालय ने कहा कि उस स्थिति में 21 जुलाई के आदेश के खिलाफ जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत पर प्राधिकारियों द्वारा पुन:विचार किया जा सकता है. इसके अलावा उनके पास सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में जाने का विकल्प भी है. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि जब यह कहा गया कि जनरल सिंह की शिकायत विचार योग्य नहीं है. उनके पास उच्चतम न्यायालय में आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. पीठ ने शुरू से ही सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर प्रश्न खड़ा किया. पीठ ने कहा कि हमें जितनी चिंता निर्णय को लेकर नहीं है उतनी निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर है जो कि दुर्भावना से ग्रस्त है. क्योंकि 21 जुलाई का आदेश अटॉर्नी जनरल की ओर से दी गई राय पर विचार करके दिया गया. जब 30 दिसंबर को सेनाध्यक्ष की ओर से दी गई वैधानिक शिकायत पर निर्णय किया गया तब अटार्नी जनरल की राय पर भी विचार विमर्श किया गया. पीठ ने कहा कि रिकार्ड की सामग्री नैसर्गिक न्याय और कानून के सिद्धांत पर खरी नहीं उतरती. अटार्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल रोहिनटन नरीमन ने सरकार के कदम का बचाव किया और कहा कि तथ्यों पर जनरल सिंह के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं बरता गया है.

न्यायालय के आदेश पर जनरल सिंह के एक वकील पुनीत बाली ने कहा कि वे इस आदेश से निश्चित रूप से प्रसन्न हैं लेकिन वे मामले के गुणदोष में नहीं जाएंगे क्योंकि मामला अभी विचाराधीन है. उन्होंने कहा कि न्यायालय की ओर से मुख्य प्रश्न यह उठाया गया कि जिस प्राधिकारी ने जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत को खारिज किया उसने अपना निर्णय अटार्नी जनरल की सलाह पर आधारित किया जिन्होंने पूर्व में सरकार को सलाह दी थी कि वह 21 जुलाई के अपने आदेश में अंतिम निर्णय करे. बाली ने मीडिया से इसके बहुत अधिक अर्थ नहीं निकालने के लिए कहते हुए कहा कि अदालत के लिए प्रश्न खड़ा करना सामान्य प्रक्रिया है. पीठ ने कहा कि हम संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर अधिक चिंतित हैं कि क्या 30 दिसंबर का यह आदेश नैसर्गिक न्याय और कानून के सिद्धांतों पर खरा उतरता है.
न्यायालय ने उनसे कहा कि आप इस आदेश पर अपना रुख तय करिए. पीठ ने सरकार से पूछा कि क्यों नहीं इस मामले को समाप्त कर दिया जाए. इस बीच यह सुझाव दिए गए कि जनरल सिंह सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के पास जा सकते हैं. पीठ ने कहा कि उन्हें अवकाश ग्रहण करने में केवल चार महीने ही शेष रह गए हैं इसलिए यह संभवत: सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं होगा.

पीठ ने साथ ही यह भी कहा कि हालाकि न्यायाधिकरण का नेतृत्व उसके अवकाशप्राप्त न्यायाधीश करते हैं लेकिन उसमें ऐसे सदस्य भी होते हैं जो सेना से आते हैं और ऐसी संभावना है कि वे किसी समय जनरल सिंह के कनिष्ठ या वरिष्ठ रहे हों. जनरल सिंह सरकार पर यह आरोप लगाते हुए इस वर्ष जनवरी में उच्चतम न्यायालय गए थे कि वह उनसे ऐसे व्यवहार कर रही है जिससे यह झलकता है कि उनके आयु मामले पर निर्णय लेने में प्रक्रिया के पालन और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत की पूरी तरह से कमी है. सेनाध्यक्ष ने सरकार ने उच्चतम न्यायालय में खींचने का यह अभूतपूर्व कदम रक्षा मंत्रालय के इस बात पर जोर डालने के बाद उठाया कि 10 मई 1950 को ही उनकी आधिकारिक जन्मतिथि मानी जाए जिससे उनका इस वर्ष 31 मई को अवकाश ग्रहण करना जरूरी हो जाएगा. जनरल सिंह ने जन्मतिथि को 10 मई 1951 नहीं बल्कि 10 मई 1950 मानने के सरकार के निर्णय को चुनौती देते हुए 68 पृष्ठ की अपनी याचिका में कहा है कि उन्होंने तत्कालीन सेनाध्यक्ष के समक्ष अपने जन्म का वर्ष 1950 होने की स्वीकारोक्ति सेना सचिव शाखा के अंतिम निर्णय से समझौता करके नहीं बल्कि नेकनीयत से की थी.

याचिका में कहा गया है कि प्रतिवादी को यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि सेना के वरिष्ठतम अधिकारी के साथ क्या ऐसा व्यवहार किया जा सकता है जिससे प्रक्रिया के पालन और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत की पूरी तरह से कमी झलकती हो और वह भी तब जबकि यह अटार्नी जनरल से प्राप्त राय पर आधारित है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है. उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि एक सेनाध्यक्ष को ‘सम्मान के साथ अवकाश ग्रहण करने का अधिकार है. सेनाध्यक्ष ने 30 दिसंबर के मंत्रालय के आदेश और उससे पहले मामले को खारिज करने वाले आदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन आदेशों ने उनके मैट्रिक प्रमाणपत्र, सेवा में आने सहित पूरे सेवा रिकार्ड, पदोन्नतियों और वार्षिक गोपनीय रिपोर्टो को सुविधानुसार नजरअंदाज किया है. उन्होंने कहा है कि विशिष्ट अलंकरणों से अलंकृत अधिकारी होने के नाते उन्होंने अपने सभी पुरस्कार, सम्मान और पदोन्नतियां 10 मई 1951 के अनुसार प्राप्त की हैं.

‘संप्रग का प्रशासनिक ढांचा ध्वस्त हो गया’

भारतीय जनता पार्टी  के नेता बलबीर पुंज ने शुक्रवार को कहा कि दूसरे कार्यकाल में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का प्रशासनिक ढांचा ध्वस्त हो गया है. सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह की वैधानिक शिकायत खारिज करने के सरकार के निर्णय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खड़े किए गए सवाल पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुंज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस पर सफाई मांगी. जनरल सिंह ने अपनी जन्मतिथि में सुधार के लिए सरकार से आग्रह किया था. पुंज ने यहां संवाददाताओं से कहा कि इससे जाहिर होता है कि संप्रग-2 का प्रशासनिक ढाचा ध्वस्त हो गया है. पुंज ने कहा कि जिस भारतीय सेना पर सभी भारतीय गर्व करते हैं, वह पूरी तरह गैरराजनीतिक रही है और एक आदर्श, पेशेवर सेना के रूप में जानी जाती है. सरकार इस विवाद को अपने स्तर पर सुलझा पाने में अक्षम साबित हुई. लिहाजा यह मुद्दा अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा है और न्यायालय ने भी अब सरकार के दावे पर सवाल खड़े किए हैं. पुंज ने आगे कहा कि लेकिन यह सरकार इतनी निर्लज्ज है कि वह इससे भी शर्मसार नहीं होगी.

प्रधानमंत्री को राष्ट्र को बताना चाहिए कि यह विवाद इस स्तर पर क्यों पहुंचा. गौर हो कि अपनी याचिका में जनरल सिंह ने कहा था कि उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1950 के बदले 10 मई, 1951 कर दी जाए. सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सेना प्रमुख से जुड़ा पूरा मामला हास्यास्पद है. न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि क्या वह जनरल सिंह की वैधानिक शिकायत को खारिज करने वाले 30 दिसंबर, 2011 के अपने आदेश को वापस लेना चाहती है. न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को करेगा.

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