नई दिल्ली. केंद्रीय बिक्री कर [सीएसटी] की समाप्ति पर होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई के मामले में केंद्र और राज्यों का टकराव बढ़ता जा रहा है। मुआवजे की राशि के आगे भुगतान से केंद्र के इंकार ने दोनों पक्षों के बीच सहमति की संभावनाओं को और धूमिल कर दिया है। इससे अगले वित्त वर्ष 2012-13 में भी वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी लागू होने की संभावनाएं भी लगभग खत्म हो गई हैं।

राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकारप्राप्त समिति ने अपनी पिछली बैठक में ही साफ कर दिया था कि मुआवजे की पूरी राशि चुकाए बिना केंद्र उन्हें जीएसटी पर सहमत नहीं करा सकता। इसके बावजूद मंगलवार को वित्त सचिव ने कह दिया कि सरकार जीएसटी लागू होने तक मुआवजे की भरपाई करने की स्थिति में नहीं है। यह मुआवजा केवल तीन वर्ष तक दिया जाना था। वहीं, राज्यों का मानना है कि अभी पहले से तय मुआवजे की राशि का ही केंद्र ने भुगतान नहीं किया है। जीएसटी पर अमल इसीलिए लटक रहा है। इसके बावजूद केंद्र आगे भुगतान करने से आनाकानी कर रहा है। केंद्र को बीते वित्त वर्ष 2010-11 में राज्यों को सीएसटी की भरपाई के तौर पर 19,060 करोड़ रुपये का भुगतान करना था, जबकि अभी तक इस मद में सिर्फ 6393 करोड़ रुपये ही जारी किए हैं।

राज्यों का कहना है कि या तो केंद्र मुआवजे की इस राशि की भरपाई करे या फिर उन्हें वैट की दर में वृद्धि का अधिकार दे। राज्यों की मांग है कि जब तक जीएसटी लागू नहीं हो रहा है, तब तक केंद्र उनके नुकसान की भरपाई करे या वैट की दर बढ़ाने की इजाजत दे। राज्य वैट की दर को मौजूदा दो से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग कर रहे हैं। वित्त सचिव आरएस गुजराल ने कहा था कि सरकार असीमित समय के लिए सीएसटी से होने वाले नुकसान की राज्यों को भरपाई नहीं कर सकती। इसका भुगतान केवल तीन साल तक किया जाना था। जीएसटी लागू करने की प्रक्रिया में सरकार ने सीएसटी की दर को पहले ही साल में चार प्रतिशत से घटाकर दो प्रतिशत कर दिया था।

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