कटनी, 9 अक्टूबर. छह वन परिक्षेत्र वाले कटनी वन मंडल में विचरण करते 22 बाघ व 18 तेंदुओं के गायब होने का रहस्य 10 वर्ष बाद भी बरकरार है. वर्ष 2001 की बाघ व तेंदुआ गणना रिपोर्ट के मुताबिक कटनी के जंगलों में 40 मांसाहारी एवं लगभग 20 हजार शाकाहारी वन्य प्राणी मौजूद थे.

वन्य प्राणियों का इतना भारी कुनवा आखिर कहां चला गया? यह बताने की हिम्मत आज भी वनाधिकारी नहीं जुटा पा रहे हैं. देश में कितने बाघ व तेंदुआ बचे हैं, इसकी गणना रिपोर्ट सार्वजनिक तौर पर कर दी गई है. कटनी वन मंडल की गणना रिपोर्ट जानने की जिज्ञासा रखे वन्य प्राणी प्रेमियों को अब तक निराशा हाथ लगी है. बाकौल वन संरक्षक मोहम्मद कासिम राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों की ताजा गणना रिपोर्ट मिली है, कटनी वन मंडल के आंकड़े अभी अप्राप्त हैं.

बता दें, कटनी तथा इसके आसपास का इलाका बाघ तेंदुआ सहित अन्य हिंसक वन्य प्राणियों की खाल तस्करी का प्रमुख केन्द्र है. यह खुलासा ‘वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडियाÓ की रिपोर्ट में हुआ है. इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शेर के संरक्षण के लिए कार्य कर रहीं मिस विलंडा राईट का कहना है कि नेपाल, भूटान आदि देश में जप्त खालों से यह पता चला था कि 7-8 वर्ष पहले कर्नाटक में पकड़े गए पारधी भी कटनी जिले के थे. कटनी में पारधी परिवार काफी हैं. कटनी जिले से लगे उमरिया एवं बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान है एवं सिहोरा के नजदीक सडार के जंगल में अत्याधिक वन्य प्राणी हैं, यह लोग इनका शिकार कर खाल व अंग बेचते हैं. कटनी रेलवे का प्रमुख जंक्शन होने के कारण यहां से खालों को इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली भेजना आसान होता है.

वहां बैठे अंतर्राष्ट्रीय तस्कर इन्हें बाहर भेज देते हैं. इस वन अपराध को रोकने एवं संशोधन एवं कड़ाई से नियमों को लागू करने के लिए कटनी में एक उच्च स्तरीय बैठक सितंबर 2002 को हुई थी. जिसमें तत्कालिक पुलिस अधीक्षक कटनी आर.बी. शर्मा, पुलिस अधीक्षक उमरिया श्री अहिरवार, एडीशनल एसपी श्री साकेत एवं रेलवे पुलिस अधीक्षक श्री डोंगरे, समस्त रेंजर, थाना प्रभारी, इंटरनेशनल वाइल्ड के मनीष कुलश्रेष्ठ, एन.एस. यादव, एक्जक्यूटिव डायरेक्टर डब्ल्यूपीएसआई के नितिन देसाई, खालिद पासा, पायल, बिंद्रा खरे तथा सुधीर मिश्रा आदि शामिल थे.

तत्कालिक वन मंडल अधिकारी के द्वारा उप वन मंडल अधिकारी एवं परिक्षेत्र अधिकारी के परामर्श के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट-2001 के मुताबिक वन परिक्षेत्र कटनी व विजयराघवगढ़ में शेर व तेंदुआ का अस्तित्व खत्म हो चुका है, की अधिकारिक पुष्टि की गई थी. जबकि बड़वारा परिक्षेत्र में बाघ नर 4 मादा 3 शावक 1, तेंदुआ नर मादा 3-3, ढ़ीमरखेड़ा में बाघ नर 6 मादा 5 शावक 1, तेंदुआ नर 4 मादा 3 शावक 2, बहोरीबंद बाघ व तेंदुआ 1-1 एवं रीठी वन परिक्षेत्र में बाघ नर 1 व शावक 1 था.

ये वन्य प्राणी आज बचे हैं या नहीं, इसकी अधिकारिक तौर पर अब तक पुष्टि नहीं हो सकी है. वन्य प्राणियों के सुरक्षित आवास सघन जंगलों में मनुष्यों की दखलंदाजी से प्रकृति का संतुलन अस्त-व्यस्त हो रहा है. मांसाहारी प्राणियों को उनका आहार नहीं मिल रहा है, जबकि शाकाहारी प्राणी मनुष्यों का आहार व पानी की तलाश में भटकते मौत का शिकार बन रहे हैं.

पूरे देश-दुनिया में शेर-तेंदुआ की घटती संख्या पर चिंता जताई जा रही है, फिर कटनी में बेपरवाही क्यों? वाइल्ड लाइफ फंड से अरबों रूपया वन क्षेत्र और वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध रहता है, लेकिन किसी व्यवस्थित कार्य योजना की अनुपस्थिति में इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकल पा रहा है.

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