इस्लामाबाद, 16 जनवरी. पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश (एनआरओ) मामले में अपने पूर्ववर्ती आदेश का पालन नहीं करने के लिए अवमानना नोटिस जारी किया। न्यायालय ने गिलानी को 19 जनवरी को खंडपीठ के समक्ष पेश होने को कहा। सात न्यायमूर्तियों की खंडपीठ ने सोमवार को अध्यादेश को लागू किए जाने से संबंधित मामले की सुनवाई शुरू की।

इस बीच, पाकिस्तान सरकार ने सहयोगी दलों के साथ बैठक कर एक अहम फैसला किया है। इसके तहत गिलानी अब कोर्ट की अवमानना के नोटिस का जवाब देंगे और सुप्रीम कोर्ट में 19 जनवरी को पेश होंगे। गिलानी को 19 जनवरी को खुद ही कोर्ट में पेश होना पड़ेगा। गौर हो कि कोर्ट की अवमानना करने के मामले में गिलानी को नोटिस जारी किया गया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि क्यों न गिलानी के खिलाफ अवमानना का केस चलाए जाए। इससे पहले, सुपीम कोर्ट ने सरकार को जरदारी के खिलाफ केस दोबारा खोलने के लिए स्विस अधिकारियों को खत लिखने के लिए कहा था। उधर, कानून मंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश का पालन होगा। फिर इसके बाद कानून मंत्री ने गिलानी से मुलाकात की। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब गिलानी को छह महीने की जेल या जुर्माना, या दोनों ही सजा संभव हो सकती है।

वहीं, राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो ने कोर्ट से माफी मांगी और माफीनामा भी दाखिल किया। इससे पहले 10 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यादेश पर अपने पूर्ववर्ती फैसले को लागू नहीं करने के लिए नाखुशी जताई थी और यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था। इससे पहले न्यायालय ने सरकार को आम माफी के कानून पर अपने निर्णय को 10 जनवरी, 2012 तक लागू करने का आदेश दिया था। सरकार से एनआरओ के तहत बंद किए गए मामले दोबारा खोलने को भी कहा गया था। न्यायालय ने सरकार को यह भी आदेश दिया था कि वह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ मामले खोलने के लिए स्विट्जरलैंड सरकार को पत्र लिखे। अध्यादेश पर अपने निर्णय के क्रियान्वयन के लिए न्यायालय ने सरकार को सात दिन का समय दिया था और रिपोर्ट पेश करने को कहा था। पांच न्यायमूर्तियों की खंडपीठ ने पांच विकल्प रखे थे, जिसमें राष्ट्रपति के खिलाफ संविधान के उल्लंघन के लिए कार्रवाई, मुख्य कार्यकारी व कानून सचिव के खिलाफ अध्यादेश पर दिए गए निर्णय को लागू नहीं करवाने के लिए अवमानना की कार्रवाई शुरू करने और उन्हें संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराने का विकल्प शामिल था।

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